विचार
वीरता की मिसाल तेलंगा खड़िया को नमन...
ABN Bureau
•
22 Apr, 2022
•
15 मिनट में पढ़ें
1 Views
विज्ञापन
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार योताम कुल्लू)। वीर सपूत शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई. में झारखंड राज्य के ग्राम मुरगू, थाना सिसई, जिला गुमला में हुआ था। वे एक साधारण किसान के बेटे थे। इनके पिता का नाम ठुईया खड़िया और माता का नाम पेती खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। उनका परिवार मुरगू गांव का पहान तथा जमींदार तथा पाहन परिवार था। उनके दादा सिरू सामाजिक, धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे।
तेलंगा बचपन से ही साहसी, ईमानदार तथा अधिक बोलने वाले थे। वे बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। कृषि और पशुपालन का कार्य से जीवनयापन किया करते थे। उनका व्यक्तित्व मिलनसार, समाजसेवी ईमानदार एवं कर्मठ नेता जैसा था। वे सभी जाति धर्म, समुदाय का आदर करते थे। वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, परंतु अपने विचार, तेजस्वी स्वभाव एवं कर्मठ समाजसेवी थे। उनकी शादी 1846 ई. में कुमारी रत्नी खड़िया से हुई थी।
तेलंगा खड़िया के मुख्य कार्य कृषि तथा पशुपालन करना था। इसके साथ-साथ अखाडे़ में अपने अनुयायियों को तीर-धनुष, तलवार एवं गदा चलाने की कला का प्रशिक्षण देना भी था। तेलंगा से इस कला का प्रशिक्षण लेने के लिए हर क्षेत्र से उनके अनुयायी अखाड़े में आते थे। इनकी सेना की संख्या लगभग 900 से 1500 तक बतायी जाती है।
शहीद तेलंगा के पिता ठुईयाखड़िया छोटानागपुर नागवंशी महाराजा के भंडारपाल थे। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी - कभी महाराजा के दरबार में जाते थे। वहां सामाजिक तथा राजनीतिक बातों की जानकारी प्राप्त करते थे। 1849-50 ई. तक छोटानागपुर में अंग्रेजों का शासन पूरी तरह कायम हो चुका था। उस समय छोटानागपुर में राजतंत्र था। राजा और जमींदारों का शासन कायम था। अन्याय, शोषण, जुल्म, बेगारी अपनी चरम सीमा पर थी। वस्तुत: प्राचीनकाल से ही जनजाति समुदाय अपनी परंपरागत स्वशासन व्यवस्था में स्वतंत्र जीवन-यापन करने के आदि थे। आदिवासी समुदाय की यह स्वतंत्रता ब्रिटिश सरकार के शासन प्रणाली में छिन्न-भिन्न हो गयी थी। इस प्रणाली के अंतर्गत मुंडा, संथाल, हो, उरांव, खड़िया एवं चेरो अपनी प्रकृति के विरूद्ध गुलामी का दंश झेल रहे थे। इन जनजातियों के विद्रोह का प्रमुख कारण ब्रिटिश सरकार की शासन व्यवस्था थी। तेलंगा खड़िया भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार थे और समाज में लोगों को अपने अधिकार के लिए आगे आने को प्रेरित भी कर रहे थे। वे गांव-गांव जाकर जागरूक तथा एकता कायम करने के लिए प्रचार करने लगे। वे गांव में जाकर जूरी पंचायत का संगठन बनाने लगे। लोगों के मस्तिष्क में अंग्रेजों से लोहा लेने का बीज बोने लगे। अनुसंधान से ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक क्षेत्रों में जूरी पंचायत का गठन कर बहुत सारे केन्द्रों की स्थापना की थी। तेलंगा का प्रमुख हथियार तलवार, तीर-धनुष था।अंग्रेजों की बंदूक एवं रायफल को तेलंगा तीर-धनुष से ही रोक लेते थे। मानो उन्हें ईश्वर का अशीष प्राप्त हो। उनकी तीर-धनुष की शक्तियों के सामने अंग्रेजी हुकूमत को भी झुकना पड़ता था। ग्राम जूरी पंचायत की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे तेलंगा के अनुयायियों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी होती गयी। जब तेलंगा खड़िया के संगठनात्मक कार्य के बारे में अंग्रेजी हुकूमत को पता चला तो उन्हें पकड़ने का आदेश जारी किया गया। तेलंगा ग्राम से बाहर रहकर ही संगठन का कार्य किया करते थे।
अनुसंधान से पता चलता है कि इस इलाके में तेलंगा खड़िया ने 1850-60 ई. के आस-पास अंग्रेजी तथा देशी सिपाहियों के दलालों के विरूद्ध उलगुलान किया था। इस उलगुलान का कारण था, खड़िया सहित अन्य लोगों की जमीन का दलालों, साहूकारों और सरकार द्वारा छीन लिया जाना। जमीन की नापी हुई, परचा पप्ता बना और ऋण का कागज दिखा कर साहूकारों ने उनकी जमीन हथिया ली।उन्हें समझ में नहीं आया कि जिस जमीन को उनके बाप-दादाओं ने बनाया था, वह सरकार की कैसे हो गयी ? जब तेलंगा सहित अन्य लोग जमीन से बेदखल हो गये तो पिंजड़े की बाघ की तरह छटपटाने लगे। पुलिस और उनके समर्थकों को वे खदेड़ने लगे।अंग्रेज सपने में भी कभी नहीं सोचे थे कि जमीन से बेदखल लोग भी उनका विरोध करेंगे। अब तेलंगा की अगुवाई में लोग घायल बाघ की तरह आक्रमण कर दिये।
जब तेलंगा और उनके साथियों ने इसका विरोध किया तो प्रशासन को बड़ी नाराजगी हुई। तेलंगा और दलालों तथा सिपाहियों के बीच उलगुलान बढ़ने लगा। तेलंगा का आक्रमण गुरिल्ला युद्ध की तरह था। विरोध हुआ तो तेलंगा और उनके साथियों ने अपने-अपने घरों को त्याग दिये। वे बारी घोरना के पीछे एवं जंगलों तथा वन कंदराओं में रहने लगे थे। ग्रामवालों ने इनके समूह को राटा टेटेंगा का नाम दिया था।तेलेंगा रूपी टेटेंगा को लोगों ने गीतों के माध्यम से सूचना देने का माध्यम बनाया था। उदारहण स्वरूप गीत देखा जा सकता है-
वे सावधान हो जाये अपनी रक्षा को।वे मौका देखकर आक्रमण भी करें। प्रथम बार तेलंगा और उसके सैनिकों ने सिपाहियों तथा दलालों पर आक्रमण किये। इस पर कुडुख और नागपुरी में भी गीतों का उल्लेख है। तेलंगा और उनके साथियों के अचानक आक्रमण को सिपाही झेल नहीं पाये। वे खदेड़ दिये जाते। दूसरी बार डोम्बा के मैदान में लड़ाई हुई।
असल में तेलंगा अपने अनुयायियों के साथ लड़ भी रहे थे और आंदोलन सर्वसाधारण रूप ले चुका था, लेकिन इसी बीच जमीन दलालों के चलते अंगे्रजों के द्वारा वे गिरफतार कर लिये गये। उन्हें लोहरदगा मुख्यालय जेल में रखा गया। लोहरदगा जेल में कुछ दिनों रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14-18 साल की कठोर जेल सजा मिली। कलकत्ता जेल से रिहा होने के बाद तेलंगा गांव आये और सिसई के अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले और विचार-विमर्श करने के बाद नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। इसकी भनक दुश्मनों को लग गयी। इसके बाद उन्होंने उन्हें मार डालने की योजना बनायी। 23 अप्रैल 1830 ई. को सिसई बाजार टांड़ मैदान में वे अपने समर्थकों के साथ ईश्वर की पूजा उपासना कर रहे थे। उसी समय उधर बड़े चप्तान के आड़ में झाड़ियों के पीछे अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह और उनके साथी छिपे हुए थे। भगवान के सामने जैसे ही तेलंगा खड़िया हाथ जोड़कर खड़े हुए बोधन सिंह ने उन पर गोली चला दी और वहीं तेलंगा शहीद हो गये। घनघोर जंगल होने के कारण कोयल नदी पार करके ग्राम सोसो नील टोली तथा चंदाली सीमा के बीच में उन्हें दफना दिया गया। उनकी समाधि के अवशेषअभी भी विद्यमान है। आज इस टांड़ को तेलंगा तोपाटांड़ के नाम से जाना जाता है। अनुसंधान में पता चला है कि पूरब बरगां निवासी बोधन सिंह को अंग्रेजों ने तेलंगा की हत्या करने के लिए 400 रुपए दिये थे। इसी प्रलोभन के चलते तेलंगा की जान ले ली थी, लेकिन कहा जाता है कि हत्यारे बोधन सिंह का वंश भी नहीं चला। वे निर्वंश होकर मर गये। (डॉ दुलार योताम कुल्लू, मानव शास्त्री एवं खड़िया समाज के चिंतक सह मानव शास्त्र विभाग, गोस्सनर महाविद्यालय रांची से जुड़े हैं।)
विज्ञापन