विचार
गंगा की निर्मलता से ही संभव है सांस्कृतिक विकास
ABN Bureau
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20 Apr, 2022
•
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक कुमार)। गंगा नदी में प्रदूषण को कम करने के लिए 1985 में गंगा कार्य योजना (जीएपी) का शुभारंभ किया गया था। इसके जल के बिना सनातन धर्म के किसी अनुष्ठान की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। गंगा नदी अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से उर्वर यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। लगभग 3 किलोमीटर चौड़ी और 100 फीट यानी 31 मीटर की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में बेहद पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां और देवी के रूप में की जाती है।
हिंदू धर्म में कहा जाता है कि यह नदी श्र्गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है, जो उत्तराखंड स्थित कुमायूं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनदी से निकलती है। इस नदी की तुलना मिस्र की नील नदी के महत्व से की जाती है।
इस पवित्र पावन नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां पाई ही जाती हैं। मीठे पानी वाले दुर्लभ डॉल्फिन भी यहां पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, खेल तथा उद्योगों-कारोबारों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। लेकिन इसकी पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की गई है। उदाहरणतया, हरिद्वार में गंगा जल में 55 सौ से अधिक कोलिफॉर्म है, जबकि कृषि के लिए माने डी श्रेणी के लिए मानक 5000 से कम कोलिफॉर्म हैं।
भारत की सबसे पावन नगरी वाराणसी में कोलिफॉर्म जीवाणु गणना, संयुक्त राष्ट्र संघ नियंत्रित विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्थापित सुरक्षित मानक से, कम से कम 3000 गुना अधिक है। पर्यावरण जीव विज्ञान प्रयोगशाला, प्राणी विज्ञान विभाग, पटना विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक अध्ययन में वाराणसी शहर में गंगा नदी में पारे की उपस्थिति पाई गई है। यहां नदी के पानी में पारे की वार्षिक सघनता 0.00023 पीपीएम थी। इन सबका असर यह है कि भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गंगा नदी की क्रमिक हत्या हो रही है। इस योजना के अंतर्गत 200 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। फिर भी प्रदूषण स्तर कम करने में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2019 में गंगा नदी की सफाई के लिए विश्व बैंक एक अरब डॉलर उधार देने पर सहमत हुआ। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में उपस्थित अवशिष्ट का अंत करने की पहल का हिस्सा है। सर्वप्रथम, हमें यह तय करना होगा कि किसी भी कीमत पर मलजल और उद्योगों का गंदा पानी गंगा में नहीं जा पाए। इसके लिए कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर इत्यादि बड़े शहरों में बड़ा ड्रेन बनाया जाए, जिसमें वाहित मल और औद्योगिक कचरा युक्त जल का ट्रीटमेंट व रिसाइकिल कर उस जल को कृषि कार्य के उपयोग में लाया जाए।
तीसरा, प्रत्येक स्नान घाट के किनारे शौचालय और चेंजिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए और उसकी साफ-सफाई का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिए। चतुर्थ, हरिद्वार से लेकर हल्दिया तक गंगा की चौड़ाई कहीं भी 3 किलोमीटर से कम नहीं रहे, इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस 3 किलोमीटर की चौड़ाई में बीच का 1 किलोमीटर जहाज आदि के आवागमन के लिए शिपिंग कारपोरेशन आॅफ इंडिया को सौंपा जाए, जिससे कानपुर से हल्दिया तक वाटर ट्रांसपोर्टेशन का मार्ग प्रशस्त हो सके। पांचवां, गंगा की चौड़ाई के दोनों ओर कम से कम फोरलेन सड़क का निर्माण किया जाए, जिससे हरिद्वार से हल्दिया तक एक नया कॉरिडोर, जो काफी उपयोगी होगा और आवागमन को आसान करेगा।
छठा, उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा का पानी की गहराई इतनी अवश्य होनी चाहिए कि युद्ध आदि विशेष परिस्थितियों में बोइंग विमान आदि इस पर उतारा जा सके। वहीं, गंगा के स्ट्रेच की चौड़ाई ज्यादा होने से टाल क्षेत्र की समस्या भी अपने आप दूर हो जाएगी।
सातवां, बिहार में बक्सर के टेल पॉइंट से सोन, गंडक आदि नदियों को जोड़कर दक्षिण-उत्तर बिहार अर्थात भभुआ, सासाराम, औरंगाबाद, गया, नवादा की ओर एक अलग चैनल बना दिया जाए तो इन जिलों में पटवन का एक बड़ा साधन विकसित किया जा सकता है। इस चैनल को कोसी, कमला, बागमती और बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ देने पर खगड़िया और दक्षिण-पूर्व बिहार के कई हिस्सों को पटवन आदि का साधन सहज ही मुहैया कराया जा सकता है।
आठवां, गंगा के तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। गंगा आरती भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। अत: उन सभी प्राचीन नगरों और शहरों यथा वाराणसी, बक्सर, पटना, सुल्तानगंज, भागलपुर आदि में नियमित रूप से गंगा आरती का कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। इससे क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
नवम, गंगा की घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ, जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवमयी और वैभवशाली है। जहां ज्ञान, धर्म, अध्यात्म एवं सभ्यता- संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई, जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। इसी घाटी में रामायण और महाभारत कालीन युग का उद्भव और विकास हुआ। प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ, जहां से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का स्वर्ण युग विकसित हुआ, जब मौर्य और गुप्त वंश के राजाओं ने यहां पर शासन किया।
दशम, और सबसे अंतिम प्रयास के रूप में गंगा सफाई अभियान को न केवल सरकारी योजना के रूप में प्रचारित किया जाए बल्कि इसे जन-आंदोलन का व्यापक रूप दिया जाए। इसमें जनता के साथ-साथ राजनेताओं और अधिकारियों को आवश्यक रूप से जोड़ा जाए। मुझे उम्मीद है कि समन्वित प्रयास से ही गंगा को भागीरथी के पुरातन रूप में पाया जा सकता है। (लेखक बिहार सरकार के पूर्व नगर विकास एवं आवास मंत्री हैं।)
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