विचार
आजादी के 75 साल बाद बढ़ती उम्मीद...
ABN Bureau
•
15 Mar, 2022
•
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। आजादी की पचहरवीं वर्षगांठ मनाने की ओर अग्रसर होते हुए नया भारत बनाने, भारत को नये सन्दर्भों के साथ संगठित करने, राष्ट्रीय एकता को बल देने की चचार्एं सुनाई दे रही है। इसकी आवश्यकता इसलिये महसूस की जा रही है क्योंकि हम आजाद हो गये, लेकिन हमारी मानसिकता एवं विकास प्रक्रिया अभी भी गुलामी की मानसिकता को ओढ़े हैं। शिक्षा से लेकर शासन व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया अंग्रेजों की थोपी हुई है, उसे ही हम अपनाये जा रहे हैं। जीवन का उद्देश्य इतना ही नहीं है कि सुख-सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत किया जाये, शोषण एवं अन्याय से धन पैदा किया जाये, बड़ी-बड़ी भव्य अट्टालिकाएं बनायी जाये और भौतिक साधनों का भरपूर उपयोग किया जाये। उसका उद्देश्य है- निज संस्कृति को बल देना, उज्ज्वल आचरण, सात्विक वृत्ति एवं स्व-पहचान। भारतीय जनता के बड़े भाग में राष्ट्रीयता एवं स्व-संस्कृति की कमी महसूस हो रही है। राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये आजादी की पचहरवें वर्ष के आयोजनों का लक्ष्य है नया भारत-सशक्त भारत निर्मित करना। अपनी पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक, संघ के प्रचारक एवं शिक्षाविद् सुनील अंबेडकर ने नया भारत निर्मित करने की आवश्यकता उजागर करते हुए उसके इतिहास में सच्चाई के प्रतिबिम्बों को उभारने पर बल दिया है। भारत के इतिहास को धूमिल किया गया, धुंधलाया गया है, अन्यथा भारत का इतिहास दुनिया के लिये एक प्रेरणा है, अनुकरणीय है। क्योंकि भारत एक ऐसा शांति-अहिंसामय देश है जिसका न कोई शत्रु है और न कोई प्रतिद्वंद्वी।
सम्पूर्ण दुनिया भारत की ओर देख रही है, उसमें विश्व गुरु की पात्रता निरन्तर प्रवहमान रही है, हमने कोरोना महामारी के एक जटिल एवं संघर्षमय दौर में दुनिया के सभी देशों के हित-चिन्तन का भाव रखा, सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास मंत्र के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया कि वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है, का भारतीय दर्शन ही मानवता का उजला भविष्य है। इसी विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे बढ़ रहा है, वह एक अनोखा और दुनिया का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। यह भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे मुखर, सबसे प्रखर आवाज है। देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता उसका मूल उद्देश्य है। जैसे-जैसे संघ का वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रभाव देश और दुनिया में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित इस संगठन के बारे में जानने और समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। इस विशाल संगठन के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं। अंबेडकर की पुस्तक संघ से जुड़ी जिज्ञासाओं का प्रभावी, प्रासंगिक एवं तथ्यपरक विवेचन करती है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रीयता की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है। भारत की हिंदू अस्मिता, हिंदू समाज की उत्पत्ति व संघटन, विवाह, माता-पिता द्वारा संतान का पालन-पोषण, आपसी सौहार्द, सामाजिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता, आर्थिक स्थितियां, कृषि, जीवनशैली तथा ऐसे ही अन्य अनेक विषयों पर इसमें मुक्त भाव से चर्चा की गई है। भारत का विश्वगुरु के रूप में अभ्युदय एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा जिसकी विवेचना लेखक ने समग्र रूप से प्रस्तुत पुस्तक में की है, जो आजादी के पचहरवें वर्ष की आयोजना का मूल केंद्र है।
राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व का अभियान लोकव्यापी बना और उसके वैचारिक पक्ष को समृद्ध बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा उनमें डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार, एमएस गोलवाकर, वीर सावरकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय प्रमुख हंै। जो नये भारत के आदर्श पात्र एवं कर्णधार हैं। राजनीतिक स्वार्थों एवं संकीर्णताओं के चलते अब तक उनको उचित सम्मान नहीं मिला, अब संघ एवं भाजपा इसके लिये प्रयासरत है, जो नये भारत की बुनियाद को मजबूती देने के लिये आवश्यक है। न केवल व्यक्ति, परिवार बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के संदर्भ में इन भारत निमार्ताओं ने आरएसएस का गहन और विस्तृत विश्लेषण करते हुए जो विचार दिए, उन्हीं विचारों को इस पुस्तक में संकलित कर हिंदुत्व अस्मिता एवं सुदृढ़ भारत का नया आलोक बिखेरा गया है। इस पुस्तक में सुनील आंबेकर ने हिंदुत्व की विशद् विवेचना करते हुए आरएसएस का विभिन्न संदर्भों- व्यक्ति, समाज, धर्म, शिक्षा एवं संस्कृति के साथ तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक संघ को परम प्रतिष्ठा देती है क्योंकि संभवत: इतनी सहज और सरल अभिव्यक्ति में संघ की गूढ़ एवं गहन विवेचना का यह अपना एक अनूठा प्रयास है।
प्रस्तुत पुस्तक में संघ के प्रति जन दृष्टिकोण एवं संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान का समन्वित प्रस्तुतीकरण है। भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं आध्यात्मिक धरोहर का सम्मान करेंगे। आधारभूत मूल्य तथा हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे। मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे। वहीं संघ के भविष्य के बारे में पुस्तक कहती है कि जब भारतीय समाज समग्र रूप में संघ के गुणों से युक्त हो जाएगा, तब संघ तथा समाज की दूरी समाप्त हो जाएगी।
उस समय संघ संपूर्ण भारतीय समाज के साथ एकाकार हो जाएगा और एक स्वतंत्र संगठन के रूप में इसके अस्तित्व की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। संघ देश के समक्ष चुनौतियों को लेकर भी अत्यंत गंभीर है। इनमें इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद अवैध घुसपैठ, हिंदुओं की घटती जनसंख्या, हिंदुओं का धर्मांतरण जैसे विषय शामिल हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ एवं सोच को परिष्कृत करेगी।
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