एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। आखिरकार रूस ने यूक्रेन पर जोरदार हमला किया है। लेकिन पुतिन कभी कमजोर और दरिद्र रूस के राष्ट्रपति थे। लेकिन पुतिन चुपचाप कब खुद को और रूस को शक्तिशाली बना लिये, इसका एहसास न विश्व को हुआ न अमेरिका समेत नाटो को। रूस को इस स्थिति में लाने के पहले एक बार पीछे मुड़ कर देखना भी आवश्यक है। क्या आज का भारत भी इससे कुछ सीख सकता है? नब्बे के दशक में सोवियत संघ का टूटना एक ऐतिहासिक घटना थी। तब हम भारतीय यह भी नहीं समझ पाये थे कि रूसी राष्ट्रपति गौर्बाच्यौफ नायक हैं या खलनायक गौर्बाच्यौफ से राजीव गांधी की बहुत घनिष्ठता थी। तब एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें राजीव गांधी को गरीब सुदामा और गोर्बाच्यौफ को कृष्ण की दिखाया गया था।दरिद्र राजीव भारत महोत्सव की पोटली लिये अमीर गोर्बाच्यौफ से मिलने मास्को पहुंचे हुये हैं। इसके बाद एकाएक सोवियत संघ टूट गया। यूक्रेन, बेलारूस, जार्जिया, सभी अलग होकर स्वतंत्र देश बन गये। जिस रूस की धमक ऐसी थी कि उसने मुजाहिदिनों वाले अफगानिस्तान में डॉ नजीबुल्ला को राष्ट्रपति बना कर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना कर रखी थी वह खुद एक झटके में कमजोरी निरीह सा दिखने लगा। रूस का टूटना कमजोर होना शीतयुद्ध की समाप्ति मानी गयी। इसे अमेरिका और नाटो के विजय के तौर पर देखा गया। सोवियत संघ टूट गया इसके बाद भी रूस की बार बार फजीहत होती रही। नाटो और अमेरिका ने उसे बार-बार धमकाया। सोवियत संघ के प्रभाव वाले पूर्वी यूरोपीय देशों में क्रांति हुई रोमानिया में तानाशाह निकोलाइ चुसेस्कू की एक जनक्रांति के बाद गोली मार कर हत्या कर दी गयी। रूस की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी थी। सोवियत संघ के टूटने के बाद बोरिस येल्तसीन राष्ट्रपति बने थे। वह पहले से ही गोर्बाच्यौफ के कट्टर विरोधी थे। येल्तसीन एक तुनकमिजाज और सनकी किस्म के व्यक्ति थे। वह शराब के नशे में अपने आर्मी बैंड को खुद निर्देशित करते हुए कई तरह की धुनें बजवाने लगते थे। रूस में लोगों को मुख्य भोजन ब्रेड तक पर आफत हो गयी थी। एकाएक आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर होगयी थी कि वहां के राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को फटे जूते और ड्रेस में खेलना पड़ा। कभी रूस की हॉकी टीम मजबूत हुआ करती थी ओलंपिक तक में उन्होंने भारत को हराया था, सुल्तान अजलान शाह टूर्नामेंट जीता था लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस की स्थिति ऐसी हो गयी कि खिलाड़ियों को पहनने के लिए बूट और जर्सी तक नसीब नहीं थे। तब का एक दिलचस्प वाकया है कि उनकी हॉकी टीम भारत आयी तो भारतीय खिलाड़ियों से हॉकी स्टिक मांग कर ले गयी। सोवियत संघ से टूटने के बाद सबसे रूस के अलावा सबसे बड़े देश यूक्रेन ने परमाणु संयत्रों और सामनों के लिये छीना झपटी शुरू कर दी। कभी अमेरिका को चुनौती देने वाले येल्तसीन ने भारत को अमेरिका के डर से क्रायोजेनिक इंजन नहीं दिया। तब इस घटना से भारत में यही संदेश गया कि रूस अब एक दीन-हीन कमजोर देश बन चुका है। रूस को सुदंर वेश्या वाला देश कहा जाने लगा। येल्तसीन का स्वास्थ्य गिरने के साथ ही उनके उत्तराधिकारी पुतिन घोषित हुये और जब पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने तब प्रांरभ में उन्हें भी कोई बहुत करिश्माई राष्ट्रपति नहीं माना गया। अपनी सत्ता को निष्कंटक बनाने के लिए पुतिन ने बंद कमरे में रूस के बड़े माफिया और सफेदपोशों से मुलाकात की और देश के कई खुफिया बातों को उनसे शेयर किया, पर पुतिन केजीबी के लिए डेढ़ दशक तक जासूसी कर चुके थे और उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। तब से लेकर अब तक पुतिन ने चुपचाप रूस को कहां से लाकर कहां खड़ा कर दिया इसका किसी को भान तक नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि दो दशक कब पार हो गये और रूस की सामरिक शक्ति फिर से चुनौती देने लायक कब तैयार हो गयी इसका अहसास न अमेरिका को हुआ न नाटो वाले यूरोपीय देशों को। भारत का झुकाव भी कुछ समय के लिये अमेरिका के प्रति ज्यादा रहा। संभवत: भारत को रूस एक कमजोर मित्र नजर आ रहा था। जबकि इस दरम्यान पुतिन रूस की सत्ता में अपने आपको निरंकुशता से काबिज कर चुके हैं। उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से भी रूस में कोई चुनौती नहीं दे सकता। विरोधियों को शातिर तरीके से ठिकाने लगा दिया जाता है। एकाएक रूस ने दो साल पहले ही अपनी शक्ति का अहसास कराया जब विश्व के सभी प्रमुख मुल्कों के राष्ट्रध्यक्ष आस्ट्रेलिया में किसी कार्यक्रम में एकत्र हुए जिसमें पुतिन भी थे तो चुपचाप एक रूसी सैन्रू पनडुब्बी पूरे आयुध के साथ आस्ट्रेलिया के समुद्र में चक्कर काटने लगा। बाद में जब अमेरिका समेत यूरोप के अन्य देशों ने इस पर आपत्ति जतायी तो रूसी नौसेना के प्रवक्ता ने कहा कि हमें कोई नहीं रोक सकता। हमारे राष्ट्रपति जहां रहेंगे हम उनकी सुरक्षा में वहां पहुंच जायेंगे। इस वाकये के बाद रूस ने अपने हाव भाव से पूरे विश्व को एक तरह से चुनौती पेश करनी शुरू कर दी। आज पुतिन किसी शातिर की तरह पेश आ रहे हैं। अजरबैजान और आर्मिनिया के युद्ध में रूस ने अपने स्वार्थ को सर्वोपरिरखा। सुरक्षा का वादा करने के बाद भी आर्मिनियाको अजरबैजान के हाथों पिटने दिया। बेलारूस में जनाक्रोश के बावजूद राष्ट्रपति लुकाशेंको को सत्ता में बनाये रखा।
ताजा यूक्रेन संकट से पहले भी पुतिन ने उससे क्रिमिया को छीन लिया है और अब नाटो और उसके नेतृत्वकर्ता अमेरिका को पुतिन उनकी औकात बता रहे हैं। एस 400 और एस500 जैसी एंटी मिसाइलें बना कर रूस अमेरिका और विश्व को डरा रहा है। पुतिन चीन से दोस्ती कर अमेरिकी खेमे को संकट में डाल चुके हैं। आज अमेरिका और नाटो सिर्फ तमाशाई है, ये सिर्फ तरह तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं जिससे पुतिन निबट लेंगे। पुतिन अपनी शर्तों पर जो चाहें सो कर सकते हैं। अफगानिस्तान में बाइडेन की नीतियों से अमेरिका की जबरदस्त हार हुई। अब पुतिन अमेरिका को खुली चुनौती दे रहे हैं। देखना है अब अमेरिका सहित नाटो देश क्या कर पाते हैं?