विचार
डॉ गौंझू की रचनाओं में दिखती है झारखंड की संवेदना...
ABN Bureau
•
09 Feb, 2022
•
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विजय केसरी)। डॉ गिरिधारी राम गौंझू की रचनाओं में झारखंड की संवेदना झलकती है। उनका संपूर्ण जीवन नागपुरी और हिंदी भाषा के उत्थान, विकास व प्रचार प्रसार में बीता था। उनकी रचनाओं में झारखंड की सोंधी महक मिलती है। नागपुरी भाषा के प्रति उनके लगाव को देखते बनता था। डॉ गिरधारी राम गौंझू का जन्म खूंटी स्थित बेलवादाग ग्राम में 5 दिसंबर 1949 को हुआ था। खूंटी में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एमए, बीएड, एलएलबी और पीएचडी की। अब तक उनकी तीस के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हैं। नए शोधार्थियों के लिए उनकी पुस्तकें एक नई राह की ओर मार्ग प्रशस्त करेंगी। बतौर एक प्राध्यापक उन्होंने एक अलग पहचान निर्मित की थी। उनकी सहजता, सरलता मृदुलता सदा विद्यार्थियों व मिलने जुलने वालों को याद आती रहेगी। उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी जितना काम किया, सदा हिंदी अनुरागियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा। डॉ गिरधारी राम गौंझू का खूंटी जैसे गांव में जन्म लेकर इस मुकाम तक पहुंचना कोई साधारण बात नहीं है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया था। विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के पश्चात वे नागपुरी भाषा विकास एवं हिंदी साहित्य सृजन के क्षेत्र में और जोर-शोर से जुट गए थे। 2021 में वे कोरोना महामारी की चपेट में आ गए और सदा सदा के लिए हम लोगों को छोड़ कर चले गए। उनका असमय जाना झारखंड के लिए एक अपूरणीय क्षति के समान है।
73 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने डॉ गिरधारी राम गौंझू को उनके नागपुरी, समग्र भाषा साहित्य सेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की। यह खबर जैसे ही झारखंड प्रांत पहुंची, झारखंड के शिक्षाविदों, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं नागपुरी भाषा प्रेमियों ने खुले दिल से प्रशंसा की। गौंझू जी की नागपुरी के साथ हिंदी भाषा में भी समान रूप से पकड़ थी। वे एक शिक्षाविद के साथ समाज सेवी भी थे। वे हमेशा जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। वे मित्रों के दुख सुख में हमेशा साथ दिया करते थे। झारखंड की लोक भाषा, कला- संस्कृति, नृत्य- संगीत विकास आदि के प्रति भी उनकी निष्ठा देखते बनती थी। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही नागपुरी और हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था। उनका यह नाता आजीवन बना रहा था।
वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड की कला संस्कृति,रहन -सहन, भाषा आदि से संबंधित लेख लिखा करते थे। उनकी सामग्रियां रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान प्रकाशित होती रहती थी। जहां तक ज्ञात है कि रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक रांची एक्सप्रेस में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई थी। प्रारंभिक दिनों में इनके कई महत्वपूर्ण आलेख इसी पत्र में प्रकाशित हुए थे। सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं। उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि झारखंड अलग प्रांत का निर्माण जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था, राज्य की दिशा और दशा अच्छी नहीं है। फलस्वरुप यहां की भाषा, संस्कृति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रांत की इस दशा पर भी झारखंड के लेखकों को अपनी कलम चलानी चाहिए। उन्होंने राज्य की दिशा और दशा पर भी काफी कुछ लिखा था।
उन्होंने समय पर मुझे उक्त सीरीज हेतु लेख भेज दिया था मैंने उनके लेख को सचित्र प्रकाशित किया था। लेख प्रकाशन के बाद उन्होंने मुझे बधाई दी थी। उनसे मेरी जब भी बातचीत हुई, उन्हें झारखंड की नहीं बेहद चिंता थी। झारखंड अलग प्रांत के संघर्ष में उन्होंने सौ से अधिक लेख इस आंदोलन को समर्पित किया था। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण जी ने गिरिधारी राम गोंझू के संबंध में ठीक ही लिखा है कि वे एक सहज सरल, मृदुभाषी व्यक्ति थे। उनका अंदर और बाहर एक समान था। वे जब भी किसी से मिलते थे, उनके चेहरे की खुशी देखते बनती थी।
वे जितना लिखते थे। उससे कहीं ज्यादा पढ़ते थे। उनकी रचनाओं में गहराई होती है। उनकी रचनाएं लोगों में आशा की किरण पैदा कर देतीं हैं। जब वे मंच से अपनी बातों को रखते थे। उनकी बातें भी गहराई होती थी। वे जिस विषय पर अपनी बातों को रखते थे। बहुत ही तन्मयता के साथ रखते थे। बिल्कुल विषयातर नहीं होते थे। वे गहराई के साथ अपनी बातों को रखते थे। लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते थे। झारखंड की लोक कला विकास, भाषा विकास और नृत्य विकास के प्रति उनकी रचनाएं निरंतर समय से संवाद करती रहेंगी। उन्हें गर्व था कि उनका जन्म एक झारखंडी परिवार में हुआ। वे झारखंड की रीति रिवाज को सहेजना चाहते थे। इसे आगे बढ़ाना चाहते थे। इस निमित्त उन्होंने असंख्य लेख लिखा जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है। अब वे उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके थे। उन्होंने लेखों का संकलन और संपादन प्रारंभ कर दिया था। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। उन्होंने जितना लिखा है, मेरी दृष्टि में पच्चास से अधिक पुस्तकें तैयार हो सकती हैं। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। झारखंड अलग प्रांत की लड़ाई में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गिरिधारी राम गौंझू झारखंड के जाने-माने चिर परिचित लेखक थे। उनकी रचनाएं हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, खबर मन्त्र, देशप्राण सहित देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती थी।
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