विचार
तेलंगा खड़िया ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव...
ABN Bureau
•
08 Feb, 2022
•
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार कुल्लू)। वीर शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई को गुमला जिला अंतर्गत सिसई थाना के मुरगू ग्राम में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ढुलिया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया और दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। तेलंगा खड़िया मूरगू ग्राम के जमीनदार तथा पाहन परिवार से संबंध रखते थे। उनके दादाजी सिरू खड़िया बहुत ही धार्मिक, साहित्यिक एवं सुलझे हुए सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। खड़िया भाषा में वीर, साहसी और अधिक बोलने वाले व्यक्ति को तेब्बलंगा कहा जाता है। वीर शहीद तेलंगा खड़िया बचपन से ही बहुत वीर, साहसी, कर्मठ एवं अधिक बोलने वाले थे। यही कारण रहा कि उनका नाम तेब्बलंगा से तेलंगा हुआ। तेलंगा खड़िया बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। वैसे तो उनकी पढ़ाई लिखाई बहुत ही कम हुई थी, लेकिन वे सरल स्वभाव वाले ईमानदार, मिलनसार एवं कर्मठ समाज सेवी यक्ति थे।
तेलंगा खड़िया का मुख्य पेशा कृषि एवं पशुपालन था। घरेलू कार्य को करते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए अपने अनुयायियों को अखाड़े में तीर-धनुष तथा गद्दा चलाने की कला का प्रशिक्षण भी दिया करते थे। ग्राम मूरगू से पूर्व में स्थिति सिसई के अखाड़े में लोगों को एकत्रित कर युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी सेना की संख्या 9 सौ से 15 सौ तक थी। तेलंगा खड़िया के सैनिकों के संबंध में खड़िया भाषा में एक लोकगीत भी प्रचलित है-
तेलंगा भैया बारियो चारियो कोना जाबे।
नौ सै कड़म के मलि छोड़ाबे।
उपर्युक्त गीत में बताया गया है कि तेलंगा भइया चारो ओर जाइएगा लेकिन नौ सौ सेना को कभी मत छोड़ियेगा। ये नौ सौ सैनिक तो तुम्हारे ही मूल सपना हैं। हे तेलंगा भइया नौ सौ सेना को कभी मत भूलियेगा इन्हें कभी मत छोड़ियेगा।
तेलंगा के पिताजी छोटानागपुर के नागवंशी महाराजा रातूगढ़ के भंडारपाल थे। नागवंशी शासन काल में भंडापाल की पदवी बहुत ही इमानदार व्यक्ति को दी जाती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खड़िया जनजाति के लोग आरंभ से ही बहुत अधिक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी-कभी महाराजा के दरबार में जाया करते थे। इस क्रम में सामाजिक एवं राजनीतिक बातों को सुनकर परिपक्व हुए। तेलंगा खड़िया आरंभ से ही शोषण और अत्याचार के सतत विरोधी थे। इससे मुक्ति के लिए वे गांव-गांव घूमकर जागृति उत्पन्न करने लगे। गांवों में जाकर ग्रामजूरी पंचायत की स्थापना करने लगे। उन्होंने 13 ग्रामजूरी पंचायत का गठन किया और अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए बिगूल फूंका। उनके द्वारा गठित 13 ग्रामजूरी की सूची भी अनुसंधान के बाद उपलब्ध हो चुका है। ये हैं- ग्राम मूरगाू सिसई, ग्रामजूरा, ग्राम डाइगढ़ नागर थाना सिसई, ग्राम देठौली थाना गुमला, ग्राम दुन्दरिया थाना गुमला, सोसो थाना गुमला, नीमटोली थाना गुमला, ग्राम बघिमा थाना पालकोट, ग्राम नाथपुर थाना पालकोट, ग्राम कुम्हारी थाना बसिया, ग्राम बेन्दोरा थाना चैनपुर, ग्राम कोलेबिरा थाना कोलेबिरा, ग्राम महाबुआंग थाना बानो। माना जाता है कि इसके अतिरिक्त भी ग्रामजूरी रहे होंगे जो अभी अज्ञात हैं।
एक बार तेलंगा जब बसिया थाना में ग्रामजूरी पंचायत का गठन कर रहे थे तभी उन्हें अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तार करने के बाद उन्हें लोहरदगा जिला मुख्यालय के जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें पकड़वाने में जमीनदरों का हाथ था। इसका वर्णन भी खड़िया लोकगीत में मिलता है। यह लोकगीत है-
लोहारदगाते जोरी बेरी ओबुसुतेमोय,
साहेब हुकुम तेरोअ, जोरी बेरी ओबसुतेमोय,
कटा रो ती, ते जोरी बेरी ओबसुतेमोय।।
इस गीत में कहा गया है कि लोहरदगा में जोड़ा भर बेड़ी (हथकड़ी) पहनाते हैं। यह हुकूम साहब देते हैं। हाथ और पांव में जोड़ा भर बेड़ी पहनाते हैं। लोहरदगा जेल में कुछ दिन रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14 साल की कठोर सजा सुनायी गयी थी। इसका उल्लेख खड़िया लोककथा एवं लोकगीतों में भी मिलता है। एक गीत उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है-
कहां कर राइज राजा ,
कहां का हिरा राजा,
राजा भाई कलिकत्ता तेलंगा का डेरा
राजा भाई कलिकत्ता तेंलेंगा का डेरा।।
जसपुर कर राइज राजा
नागपुरी कर हिरा राजा भाई कलिकता .....
बुडु कर कर राइज राजा, राजा भाईकलि ...
पांच भाषा पांचों परगना, राजी तोरा के
तेलेंगा न डोले देबे।।
कलकत्ता जेल से छूटने के बाद तेलेंगा पुन: अपने गांव लौट आये और सिसई अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले। आंदोलन के लिए विचार-विमर्श किये और फिर नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। तेलेंगा खड़िया अंग्रेजी हुकूमत को भारत से उखाड़ फेकने के लिए अजीवन संघर्ष किये। स्वतंत्रता आंदोलन उनके द्वारा दी गयी कुबार्नी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम मना रहे हैं, झारखंड की धरती में जन्मे तेलेंगा खड़िया जैसे प्रत्येक वीर सपूतों के संघर्षपूर्ण जीवन को संकलित कर प्रकाशित कराना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अंत में प्रेमधवन द्वारा शहीद फिल्म में लिखित गीत की पंक्तियां सहज ही याद आ जाती है- जलते भी गए कहते भी गये
आजादी के परवाने
जीना तो उसी का जीना है
जो मरना देश पर जाने।।
(लेखक मानवशास्त्री और खड़िया समाज के चिंतक हैं।)
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