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धनतेरस...

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त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कार्तिक मास के त्रयोदशी के रात्रि से धनतेरस के रूप में दीपावली के 5 दिवसीय त्यौहार का शुभारंभ हो जाता है। धनतेरस का त्योहार आरोग्यता एवं धन के बल की समृद्धि के कामना की भावना से जुड़ा हुआ है।

पुराण के अनुसार देवता एवं दानव के द्वारा संयुक्त रूप से समुद्र मंथन से 14 रत्न प्राप्त हुए थे जिनमें एक भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे; उन्हें आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान का प्रणेता माना जाता है और उन्हें भारतीय समाज में आदि-वैद्य की मान्यता प्राप्त है।

 दीपावली में निवास स्थान परिसर की साफ सफाई इत्यादि सीधा हम सभी के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। दीपावली के त्यौहार में गणेश जी महाराज और लक्ष्मी माता के पूजा का विधान है। गणेशजी महाराज विघ्न-बाधा का हरण करते हैं तो माता लक्ष्मी धनबल से परिपूर्ण करती है।

दीपावली का यह संपूर्ण त्यौहार स्वास्थ्य-बल एवं धन-बल में संतुलन का प्रयाय है। स्वास्थ्य के बिना धन का उपयोग नहीं किया जा सकता है और धन के अभाव में स्वास्थ्य को पोषित नहीं किया जा सकता है। स्वास्थ्य बल एवं धन बल के खर्चे में भी तालमेल एवं संतुलन कितना आवश्यक है सहज अनुमान का विषय है। 

निवास परिसर की पवित्रता के बाद धनतेरस के संध्या घर के मुख्य द्वार, तुलसी के पीठ, पूजा स्थल एवं खिड़की इत्यादि में दीप प्रज्वलित करते हुए प्रकाश के माध्यम से अंधकार को दूर करने का क्रिया किया जाता है। अपने बाहरी एवं आंतरिक अंधकार को दूर करने का प्रयास धनतेरस के दिन से प्रारंभ हो जाता है।

धनतेरस के दिन अर्जित धन से अपनी जरूरत की वस्तुओं खरीदारी की प्रथा भी है। अर्जन एवं वितरण का संतुलन परिवार एवं समाज में बना रहे; ऐसी व्यवस्था भारतीय संस्कृति के इस त्यौहार में प्रमुख भावनाओं में से एक है। 

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