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दीया : मिट्टी से मिट्टी तक का सफर...

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दीया : मिट्टी से मिट्टी तक का सफर...
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अजय सानी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रोशनी का त्योहार दिवाली बिल्कुल करीब है। लाइट बेचनेवाले दुकानदार अपनी दुकानें सजा कर बैठे हुए हैं। दिवाली उनके लिए त्योहार से ज्यादा अच्छी दुकानदारी और आमदनी की उम्मीद लेकर आया है। ऐसे में कुम्हार भी अपनी उम्मीदों के दीये बना रहे हैं, जो उनका खनदानी पेशा के साथ भविष्य की राह है। 

ऐसे में मिट्टी के दीयों की अपनी एक अलग कहानी है। क्योंकि दीये मिट्टी से बने और मिट्टी में मिल गये... लेकिन जाते-जाते रोशनी बिखेर गये। हर दीये की यही कहानी है... लेकिन इन दीयों को बनाने वालों की भी एक कहानी है। आप इन्हें बाजार से खरीद तो लाते हैं, लेकिन इन्हें बाजार तक लाने वालों के पीछे की कहानी शायद ही जानते हों। कभी सोचा है, कोई हाथ मिट्टी खोदता है, उसे सानकर गीला करता है, फिर उसे आकार देकर एक दीये में बदलता है। 

इस लंबे सफर के पीछे एक संघर्ष है और कई परेशानियां भी। परेशानी उन्हें वाजिब दाम न मिलने की, परेशानी अगली पीढ़ी के इस काम से हाथ खींच लेने की। आइये, हम इस दिवाली अधिक से अधिक मिट्टी के दीयों को खरीदें; क्योंकि ये एक त्योहार नहीं देश के लाखों कुम्हार परिवारों की उम्मीदों का एक पुलिंदा भी है।

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