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व्यर्थ की चिंता...

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व्यर्थ की चिंता...
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त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भौतिक/सांसारिक जीवन में धन का बल प्रत्यक्षत: अत्यंत महत्वपूर्ण है और आज भी देखा जा सकता है कि किसी के भी किसी भी प्रकार के क्रियाकलाप के पीछे धनार्जन हीं प्रमुख उद्देश्य होता है। एक परिवार के संचालन तथा परिवार के बच्चों के भविष्य निर्माण का आधार भी वास्तव में धन की शक्ति ही होती है। एक कहावत प्रचलित है कि;  

पूत सपूत तो क्या धन संचय,  पूत कपूत तो क्या धन संचय।। 

हर माता-पिता चिंतित रहते हैं कि एक दिन जब हम नहीं रहेंगे तो मेरे संतान का क्या होगा? स्थापित सिद्धांत है कि हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है। पंछी का स्वभाव है कि वह तब तक अपने बच्चों का देखभाल करता है जब तक वे पूर्णत: उड़ने के लायक नहीं बन जाते हैं, उड़ने के लायक बनते ही पंछी के बच्चों का स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता है; लेकिन मनुष्य इस यथार्थ को झूठलाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रहने देता है। इसी को व्यर्थ की चिंता कहते हैं।

बच्चों को शिक्षा-दीक्षा, संस्कार, स्वालंबन स्वाभिमान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण करना अभिभावकों का परम कर्तव्य है बाकी ईश्वरीय विधान के अनुसार हर किसी को अपने पैरों के सहारे ही खड़ा होना पड़ता है। कर्तव्य का निर्वहन करना कुछ और बात है, व्यर्थ की चिंता करना एक अतिरिक्त बात है।

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