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क्या वैभव सूर्यवंशी का कैरियर खत्म करना चाहते हैं गौतम गंभीर?

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क्या वैभव सूर्यवंशी का कैरियर खत्म करना चाहते हैं गौतम गंभीर?
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पवन कुमार पाण्डेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गंभीर पर ये आरोप कोई और नहीं क्रिकेट प्रशंसक उठा रहे हैं। लोगों का आरोप है कि गौतम वैभव को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं? मैदान पर उतरकर पहली ही गेंद से बेखौफ होकर चौके-छक्के बरसाना और इंटरनेशनल गेंदबाजों के होश उड़ा देना किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए सपने जैसा होता है। बिहार के लाल और भारतीय क्रिकेट के सबसे कम उम्र के सनसनीखेज प्रतिभा वैभव सूर्यवंशी ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पिछले मुकाबले में विस्फोटक शुरुआत देकर वही किया, जिसकी उम्मीद पूरे देश को थी। 

लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जिस लड़के ने अपने बल्ले की धमक से पूरे क्रिकेट जगत का ध्यान खींचा, अगले ही मैच में टीम मैनेजमेंट ने उसे सीधे प्लेइंग इलेवन से बाहर कर बेंच पर बैठा दिया। हेड कोच गौतम गंभीर और कप्तान श्रेयस अय्यर के इस चौंकाने वाले फैसले के बाद अब सोशल मीडिया से लेकर क्रिकेट गलियारों तक फैंस और एक्सपर्ट्स का गुस्सा सातवें आसमान पर है। 

सवाल उठना इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि भारतीय टीम पहले ही सीरीज अपने नाम कर चुकी है। ऐसे में क्रिकेट का सीधा सा नियम और परंपरा यही कहती है कि जब सीरीज हाथ में हो, तो युवा और इन-फॉर्म खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच टाइम देकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया जाये। लेकिन यहां उल्टा देखने को मिला—जिस 13-14 साल के बच्चे के हौसले को आसमान छूना चाहिए था, उसे अगले मैच में साथी खिलाड़ियों को बाउंड्री लाइन पर पानी पिलाने के लिए छोड़ दिया गया। सोशल मीडिया पर फैंस सीधे तौर पर पूछ रहे हैं कि क्या यह वही आक्रामक और निडर क्रिकेट का विजन है जिसकी बातें प्रेस कॉन्फ्रेंस में की जाती हैं? 

क्रिकेट पंडित भी इस फैसले को सरासर बचकाना और आत्मघाती बता रहे हैं। सदियों में ऐसा कोई कुदरती टैलेंट सामने आता है जो इतनी छोटी उम्र में बिना किसी दबाव के इंटरनेशनल दर्जे की गेंदबाजी के सामने छा जाता है। जब कोई युवा बल्लेबाज अपनी लय और प्रचंड फॉर्म में हो, तब उसे रोटेशन या अजीबोगरीब टीम कॉम्बिनेशन के नाम पर बाहर बैठाना उसके मानसिक मनोबल पर सीधा आघात करने जैसा है। एक तरफ जहां कुछ फ्लॉप खिलाड़ियों को अपनी लय तलाशने के लिए दर्जनों मौके दिये जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक विस्फोटक पारी खेलने के बावजूद इस होनहार लड़के को बाहर का रास्ता दिखा देना भारतीय टीम मैनेजमेंट की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 

अगर देश के सबसे बेहतरीन और दुर्लभ टैलेंट को तराशने के बजाय अजीबोगरीब रणनीतियों की बलि चढ़ाया जायेगा, तो इससे न सिर्फ एक उभरते सितारे का आत्मविश्वास टूटेगा बल्कि ड्रेसिंग रूम की नीयत पर भी उंगलियां उठेंगी। मैनेजमेंट को यह समझना होगा कि प्रतिभा को संवारने का काम उसे मैदान पर खुलकर खेलने की आजादी देकर किया जाता है, डगआउट में बैठाकर नहीं!

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