- भाजपा अध्यक्ष नीतिन के सार्थक प्रयास और झारखंड भाजपा में मॉस कॉम्यूनिकेटर की कमी
बासुकीनाथ पाण्डेय
एबीएन डेस्क। भाजपा पस्त है और त्रस्त भी। जी हां, झारखंड राज्य में उसके पास नेताओं की कमी और विशेषकर वैसे नेताओं की कमी है,जो पूरे राज्य में सरकार की कमियों के खिलाफ खड़ा हो सके। वरिष्ठ पत्रकार पंकज प्रसून ने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि एक तस्वीर अच्छी लगी। सही में यह तस्वीर अच्छी है। पंकज लिखते हैं-
पिछले कुछ सालों में झारखंड भाजपा की सबसे अच्छी तस्वीर अगर लगी, तो ये वाली है।
सच कहूं तो ये स्प्रीट जिंदा रहना चाहिए। यही बीजेपी का मतलब भी है। यहां दायित्व होता है, पद का अहंकार नहीं। किसी भी कार्यकर्ता या समर्थक का मन खट्टा हो जाता है, जब वो प्रदेश के बड़े नेताओं के बीच गुटबाजी देखता है। लेकिन वही मन गर्व और उत्साह से भर जाता है जब राष्ट्रीय अध्यक्ष, बूथ अध्यक्ष, मंडल अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष, एक ही लक्ष्य के लिए मिशन मोड में काम करते हैं। जिसको भी लगता है कि वो बड़ा नेता बन गया तो थोड़ा "कमल" निशान से अलग होकर चुनाव लड़ लें, औकात का पता चल जाएगा।
कार्यसमिति की बैठक में जो सौदान सिंह जी का संबोधन था, अद्भुत। मतलब मजा आ गया। सौदान सिंह पहले भी यहां काम कर चुके हैं। उन्हें सब जानकारी है कि कौन क्या है? एक बात और, ये वाले संगठन मंत्री नीचे कार्यकर्ताओं के बीच बैठे थे। पहले वाले तो स्टेज छोड़ते ही नहीं थे। सुखद बदलाव।
पंकज जी वरिष्ठ पत्रकार हैं लेकिन झारखंड भाजपा की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण पर गौर करना आवश्यक है।
पीछे जाए तो रघुवर दास की पहली भाजपा सरकार थी जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। काम भी किया। सरकार की सक्रियता नजर भी आई। लेकिन राजनीतिक बिंदुओं पर शीर्ष नेतृत्व ने राजनीतिक छूट देकर कितनी बड़ी गलती की, जिसे हर सामान्य समर्थक भी समझ रहा था।
सरयू राय जैसे शीर्ष व्यक्ति से विवाद, सुदेश महतो से सीटों का समझौता नहीं करना, सीट बंटवारे में पारदर्शिता का अभाव। क्या शीर्ष नेतृत्व इन बिंदुओं को नहीं समझा? अवश्य समझा। नजर अंदाज किया या अति आत्म विश्वास में झारखंड की सत्ता गंवा दी। अब दूसरी बार भी हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि झामुमो की सरकार ने मईंया योजना में लगभग 50 लाख परिवार को सीधे प्रभावित कर दिया।
रघुवर सरकार कल्याणकारी योजनाओं में कृपण रहे। आज 200 यूनिट बिजली फ्री है जिससे लाखों परिवार को सीधा लाभ मिला।
आखिर चुनाव जीतने की क्षमता कम होती जा रही है। भाजपा नेताओं का जनता के लिए संघर्ष न के बराबर है।
उदाहरण से समझें। रांची के कांके और खिजरी सीट पर भाजपा हार गयी। खिजरी में दुबारा हार गयी। शहरी सीटों पर भाजपा की हार झारखंड में एक आश्चर्यजनक पहलू है। कांके विस सीट के उदाहरण को समझें। यहां की एक मुख्य सड़क जो रांची से चिरौंदी और बोड़या होते हुए रिंग रोड को जोड़ती है। यह सड़क दो वर्ष से टूटी है। हर दिन चार से पांच दुर्घटना हो रही है।
भाजपा कांके से हार चुकी है, कांग्रेस को विधायक में कोई संवेदनशीलता नहीं है। भाजपा क्या कर रही है? यह जन मुद्दा है लेकिन कांके भाजपा सो रही है। क्या यह भाजपा का कांग्रेसीकरण नहीं है? यही हाल पूरे राज्य में है। जहां भाजपा जीती है वहां भी सोई है और जहां हारी है, वहां बेहोश है।
एक बड़ा जनाधार राष्ट्रीय कारणों से भी नाराज है और स्थानीय नेता तो एसी से बाहर निकलते ही नहीं। राजनीति में सत्ता पाने के बाद की सुस्ती बड़ी खतरनाक होती है और झारखंड भाजपा इसी का शिकार है।