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तुलसीदास की रचनाओं में भी है मां दुर्गा की आराधना

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तुलसीदास की रचनाओं में भी है मां दुर्गा की आराधना
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डॉ हराधन कोईरी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शारदीय नवरात्र में सभी भक्तगण माता की पूजा हेतु तैयारी में तन, मन से जुटे हुए हैं। नवरात्र में देवी दुर्गा के नौ रुपों की पूजा-उपासना की जाती है। देवी का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। दूसरा का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथा स्वरूप को कूष्माण्डा कहते हैं। पांचवां का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवां कालरात्रि और आठवां स्वरूप  महागौरी के नाम से जाना जाता है।भगवती का नौवां स्वरूप सिद्धिदात्री के नाम से जगत विख्यात है। भगवती दुर्गा के इन नौ स्वरूपों को इस श्लोक के माध्यम से जाना जा सकता है- 

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं  ब्रह्मचारिणी। 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। 
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। 
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्। । 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। 

भगवती जगदम्बा का पूजन प्रत्येक नर-नारी को करना चाहिए। उनके पूजन से मनुष्य धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार चारों वर्ण के स्त्री- पुरुष एवं चारों आश्रम के लोग उनकी सेवा करने के अधिकारी हैं। साथ ही शाक्त के अतिरिक्त शैव,वैष्णव,सूयोर्पासक और गणेशोपासक सभी इनकी आराधना कर परम शांति को प्राप्त कर सकते हैं। भेद कहीं है तो केवल मनुष्य के मस्तिष्क में।  
महाकवि तुलसीदास उदार हृदय संपन्न विराट समन्वयवादी कवि थे। उनकी उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण उनकी विनय पत्रिका है। विनय पत्रिका में सभी देवी-देवता की स्तुति करते हैं और उनसे राम की निश्चल भक्ति मांगते हैं। इस क्रम में वे भवानी से कहते हैं-  

जय जय जगजननि देवि सुर-नर मुनि-असुर-सेवि, 
भुक्ति-मुक्ति-दायिनी,भय-हरणि कालिका।  
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि,पर्वशर्वरीश-वदनि, 
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका ।। 

तुलसीदास कहते हैं कि हे जगत् की माता! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष को देने वाली हो। भक्तों के भय को दूर करने के लिए तुम कालिका हो। तुम कल्याण करने वाली हो सुख-समृद्धि का घर हो। तुम ही आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ताप को दूर करने वाली हो। इसलिए हे शिवे! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक नाम और रुप हैं। तुम समस्त संसार की स्वामिनी हो। हिमाचल की कन्या हो। हे शरणागत की रक्षा करने वाली माता! मेरी रक्षा करो -- 

जय महेश भामिनी, अनेक-रुप-नामिनी, 
समस्त-लोक-स्वामिनी,  हिमशैल-बालिका। 
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम, 
देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ।। 

तुलसीदास मां जगदम्बा से विनती करते हुए कहते हैं - तुम रुप, सुख और शील की सीमा हो, दुष्ट के लिए तुम भयानक रुप धारण करने वाली हो। तुम्हीं लक्ष्मी,तुम्हीं पार्वती और तुम्हीं श्रेष्ठ बुद्धि वाली सरस्वती हो। हे जगजननि! तुम कार्तिकेय और गणेश की माता हो और शिव की गृहिणी हो। हे भवानी!

तुम्हारी जय हो, जय हो-- रुप-सुख-शील-सीमाऽसि,भीमाऽसि, 
रामाऽसि,वामाऽसि बर बुद्धि बानी। 
छमुख-हेरम्ब-अंबासि, जगदंबिका, 
शंभु-जायासि जय जय भवानी।।  

आगे वे कहते हैं तुम्हीं ने चण्ड दानव को और महिषासुर को मारने वाली हो। मुण्ड दानव के घमंड को तोड़ने वाली हैं। शुम्भ-निशुम्भ को मारने वाली हो। तुमने अपने क्रोध रुपी समुद्र में शत्रु के दल-के -दल को डुबो दिये हैं। वेद,शास्त्र एवं शेषजी भी आपकी महिमा का गुणगान करके पार नहीं पाते हैं- 

निगम-आगम-अगम गुर्वि! तव गुन-कथन, 
उर्विधर करत जेहि सहसजीहा।। 

हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भवसागर से मेरी रक्षा कर सकती हो। आप सर्वार्थ दायिनी हैं, कल्याणी हैं। इस प्रकार तुलसी ने दो ही पदों में मनुष्य के सांसारिक भव-बाधा को उपस्थित किया है। मानव जाति का कल्याण भगवती जगदम्बा की कृपा से ही हो सकती है। इसलिए, आइए! हम सब मिलकर भगवती से वैश्विक कल्याण की कामना करें! (लेखक गोस्नर कॉलेज रांची हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं। निवास चोगा, सोनाहातू, रांची)

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