- दिशोम गुरु की ढाल थीं रूपी सोरेन: संघर्ष की वह कहानी जो इतिहास के पन्नों में पीछे छूट गई
यशराज सिंह
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के आंदोलन का इतिहास दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नाम के बिना अधूरा लगता है, पर उनकी पत्नी रूपी सोरेन के संघर्ष से शायद ही झारखंडवासी अवगत हैं, जबकि रूपी सोरेन ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में उनका साथ निभाया था।
रूपी सोरेन के निधन के साथ केवल एक परिवार ने अपनी मां को नहीं खोया है, बल्कि झारखंड आंदोलन के एक ऐसे मौन अध्याय का भी अंत हुआ है, जिसकी चर्चा सार्वजनिक इतिहास में अपेक्षाकृत कम हुई है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित शिक्षक थे और महाजनी शोषण के विरोध के लिए जाने जाते थे। रूपी सोरेन उनकी एक प्रिय छात्रा थीं, जो बचपन से ही निडर, साहसी और होशियार थीं। शायद यही कारण था कि सोबरन सोरेन की इच्छा थी कि रूपी सोरेन उनके घर की बहू बनें।
शिबू सोरेन और रूपी सोरेन का विवाह छोटी उम्र में ही करा दिया गया था। वर्ष 1957 में सोबरन सोरेन की हत्या ने किशोर शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के आदर्शों से प्रभावित होकर महाजनी प्रथा, आदिवासी शोषण, हड़िया-शराब, आदिवासियों में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया। रूपी सोरेन का जीवन भी इसी संघर्ष के बीच आकार ले रहा था।
शिबू सोरेन की पत्नी के रूप में रूपी सोरेन ने केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं संभाली, बल्कि उनके संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन में निरंतर उनका साथ दिया। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग विशेष रूप से सामने आता है। जब शिबू सोरेन पहली बार जेल गए थे, तब परिवार आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। इसी दौरान एक महाजन बिस्तु साव उनके खेत की फसल काटने पहुंचा। परिवार की ओर से तत्काल कोई विरोध न देखकर रूपी सोरेन ने स्वयं प्रतिरोध करने का निर्णय लिया।
उन्होंने धान काटने वाले औजार हंसुआ को हाथ में लिया और महाजन को खेत से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। यह प्रसंग केवल एक खेत की रक्षा का प्रसंग नहीं था; यह उस साहस का उदाहरण था, जिसके साथ रूपी सोरेन ने अपने परिवार और अपने पति के संघर्ष को संभाला। शिबू सोरेन के जेल में रहने के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कठिन हो गई थी कि उनकी जमानत के लिए भी पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं थे।
ऐसे समय में रूपी सोरेन ने अपने मायके से सहायता लेने का प्रयास किया। जेल में कमजोर हो चुके शिबू सोरेन की उन्होंने दिन-रात सेवा की और उन्हें स्वस्थ किया। लेकिन वह जानती थीं कि उनके स्वस्थ होते ही वह फिर झारखंड के आदिवासियों के अधिकारों के संघर्ष में लौट जाएंगे। 1970 के दशक में शिबू सोरेन का संघर्ष और अधिक कठिन दौर में पहुंचा। टुंडी और पारसनाथ की पहाड़ियों का क्षेत्र उनके आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
महाजनों और साहूकारों के खिलाफ आदिवासियों को संगठित करने और उनके अधिकारों के लिए धान कटनी आंदोलन चलाने के कारण उन्हें लंबे समय तक भूमिगत रहना पड़ा। इस दौर में रूपी सोरेन के सामने दोहरी चुनौती थी—एक ओर पति की सुरक्षा की चिंता और दूसरी ओर परिवार की जिम्मेदारी। जब पुलिस शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ करने घर आती थी, तब रूपी सोरेन उनका सामना करने से पीछे नहीं हटती थीं।
पुलिस की ओर से शिबू सोरेन को मुठभेड़ में मार दिए जाने की धमकी भी दी जाती थी। ऐसे कठिन समय में स्वयं को संभालने के साथ-साथ रूपी सोरेन ने परिवार को भी मजबूती से थामे रखा। यहां तक कि शिबू सोरेन की तलाश में वह अपनी सास और ननद के साथ टुंडी के जंगलों तथा पारसनाथ की पहाड़ियों तक जाती थीं। उस समय उनकी गोद में उनके छोटे बच्चे भी होते थे। वर्ष 1999 में रूपी सोरेन ने दुमका लोकसभा सीट से बाबूलाल मरांडी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा।
हालांकि वह बाबूलाल मरांडी से पांच हजार से भी कम मतों के अंतर से चुनाव हार गईं, लेकिन रूपी सोरेन भी दिशोम गुरु के सिद्धांतों में विश्वास करती थीं। वह किसी विशेष जाति या जनजाति के कल्याण के बजाय झारखंड के सभी निवासियों के कल्याण की समर्थक थीं। हालांकि, दिशोम गुरु शिबू सोरेन की खराब होती स्वास्थ्य स्थिति के कारण रूपी सोरेन ने कोई और चुनाव नहीं लड़ा और अपना जीवन उनकी देखभाल में समर्पित कर दिया।
वर्ष 2024 में जब हेमंत सोरेन की सरकार बनी, तब एक साक्षात्कार में उन्होंने सरकार से झारखंड के हर निवासी के विकास का भरोसा जताया था। इतिहास अक्सर आंदोलन के नेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन उन परिवारों और विशेषकर उन महिलाओं के संघर्ष को दर्ज नहीं कर पाता, जिन्होंने उस आंदोलन को अपने निजी जीवन की खुशियों के बलिदान पर संभव बनाया।
रूपी सोरेन की विदाई के साथ झारखंड ने एक ऐसी मां को खो दिया, जिसने अपने जीवन में संघर्ष को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे जिया था। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि किसी भी बड़े जनआंदोलन के इतिहास में केवल मंच पर दिखाई देने वाले चेहरों का योगदान नहीं होता; कई बार उसकी सबसे मजबूत नींव उन लोगों के साहस से बनती है, जिनका नाम इतिहास की सुर्खियों में नहीं आता। रूपी सोरेन को विनम्र श्रद्धांजलि। (लेखक इतिहास विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के शोधार्थी हैं।)