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मनुष्य के स्वभाव की विडंबना...

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मनुष्य के स्वभाव की विडंबना...
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  • मनुष्य के स्वभाव की विडंबना...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मनुष्य के स्वभाव का विचित्र विडंबना है कि उसकी पूरी जीवन दुनिया को यह समझाने में व्यतीत हो जाती है कि वह क्या चीज है। 

हर एक व्यक्ति को अपने उलझन, परेशानी, दुख और अपने द्वारा किये गये अच्छे बुरे कार्यों को दूसरों से मान्यता तो चाहिए परंतु वह किसी दूसरे को मान्यता देने के लिए कभी तैयार होता ही नहीं है। गति एवं प्रवाह ही जीवन है, जहां दोनों रुके कि जीवन मृत्यु में परिवर्तित हो जाती है।

दोनों में यदि व्यवधान उत्पन्न हुआ तो रोग धर दबोचता है। नदियों के प्रवाह में जो जल बह जाती है वह वापस नहीं लौटती है। जल आते रहते हैं प्रवाहित होकर समुद्र में मिल जाते हैं। जीवन में घटित होने वाले घटनाएं नदी के प्रवाह के भांति किनारों से टकराती तो जरूर है परंतु जब बाढ़ का स्वरूप ग्रहण कर लेती है तो विनाश की विभीषिका उत्पन्न कर देती है।

अपने कार्यों के लेखा-जोखा का स्मारक एक दिन इतना भारी हो जाता है कि उसे ढोना मुश्किल हो जाता है और उसके बोझ के तले दबा हुआ आदमी कराहते रहता है, उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। जिस दिन जिस घड़ी दूसरों से प्रशंसा सुनने का काम बंद हो जाता है ठीक उसी क्षण से आदमी स्वतंत्र हो जाता है। 

उसके स्मारक के बोझ से वह मुक्त हो जाता है। उसके मैं वाले बोध का परत हट जाता है, अहंकार तिरोहित हो जाते हैं और उसका अपने वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार हो जाता है। जीवन की यात्रा महासागर में सरलता से विलीन हो जाती है, तथा वह स्वयं महासागर बन जाता है।

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