Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 14
होम देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन
विचार

भारतीय राजनीति में विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूप

शेयर करें: WhatsApp Facebook X Back to ePaper
भारतीय राजनीति में विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूप
विज्ञापन
  • भारतीय राजनीति में विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूप

अति परिचय होत है

अरुचि अनादर भाय,

मलयागिरि की भीलनी

चंदन देत जराय।

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बताया जाता है कि परिचय के लंबे दौर से मोह भंग होने लगता है, लेकिन विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूप में बना रहता है। आज के भारतीय राजनीति में लगभग यही स्थिति बनी हुई है। 

नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के राहुल गांधी और इं.डि.या. गठबंधन के अन्य नेताओं को वह कारण नहीं मिल रहा है कि क्यों मोदी जी के लगभग 12..13 साल के कार्यकाल के बाद भी जन सामान्य का आकर्षण उनके प्रति बना हुआ है। राज्यों में चुनाव दर चुनाव भाजपा की जीत होते जाना विपक्ष के लिए रहस्य का कारण बना हुआ है। 

विपक्ष कहता रहा है कि वोट की चोरी हो रही है, ईवीएम मशीन को हैक किया जा रहा है, मतदाता सूची में गड़बड़ी किया जा रहा है; लेकिन उनके ओर से अभी तक देश के सामने कोई अकाट्य ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सके हैं।

पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को कम सीट आई, तमिलनाडु और केरल में भाजपा कुछ नहीं कर पाई, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में गैर भाजपा की सरकार है; ऐसे में मतदान में गड़बड़ी के आरोप स्वत: झूठा सिद्ध हो जाते हैं। 

भाजपा एवं मोदी जी के प्रति जन सामान्य का मोह भंग होने का इंतजार कर रहे राहुल गांधी एवं अन्य विरोधी नेता मजबूत विकल्प देने में नाकामयाब रहे हैं, तो जानता अंधकूप में क्यों कूद पड़ेगी? 

हर देश में अवैध घुसपैठ का विरोध किया जाता है। मतदाता सूची को दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर उनका गहन पुनरीक्षण किया जाता है; लेकिन भारत में विरोध किया जाता है। संविधान एवं देश के सुरक्षा का प्रश्न खड़ा किया जाता है। अभद्र भाषा एवं गाली गलौज से मतदाता लुभाये नहीं जा सकते हैं। संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे कर जनता में मोह और लगाव उत्पन्न नहीं किया जा सकता है।

भारत में लोकतंत्र के लंबी अवधि के बाद और आज के सूचना तकनीक की उपलब्धता के जमाने में जनता को उल्लू बनाना यदि समाप्त नहीं हुआ है तो सरल भी नहीं रह गया है। बाकी चुनाव के परिणाम में बहुत सारे आयाम होते हैं, चुनाव लड़ने वाला हर कोई उसे साधता ही है.. "जो जीता वही सिकंदर"

विज्ञापन