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डॉक्टरों के प्रति संवेदनशीलता : समय की मांग

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डॉक्टरों के प्रति संवेदनशीलता : समय की मांग
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  • डॉक्टरों के प्रति संवेदनशीलता : समय की मांग

प्रो. प्रेम नारायण सिंह

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले दिनों एक दैनिक समाचार पत्र में देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में मेडिकल छात्रों तथा रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या से जुड़ी खबर प्रकाशित हुई। 

किसी युवा की असमय मृत्यु, विशेषकर आत्महत्या, निस्संदेह परिवार, समाज और देश के लिए गहरा आघात है। ऐसे हर मामले पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि हम इन घटनाओं के पीछे छिपी परिस्थितियों को समझें और यह सुनिश्चित करें कि ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति न हो। जब जीवन बचाने वाले ही जीवन से हारने लगें, तब यह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं रह जाता; यह हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाता है। हम चिकित्सक को सामान्यत: जीवनदाता, संकटमोचक और आशा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

अस्पताल के किसी आपातकालीन कक्ष में जब मरीज और उसके परिजन भय और असमंजस में होते हैं, तब उनकी निगाहें डॉक्टर पर टिकी होती हैं। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में एक सवाल अक्सर अनदेखा रह जाता है—जिस डॉक्टर पर किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन निर्भर है, उस समय उसकी अपनी मानसिक और शारीरिक स्थिति कैसी है?
26 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, मार्च से 24 सितंबर के बीच लगभग छह महीनों में देश के 11 मेडिकल कॉलेजों एवं चिकित्सा संस्थानों के 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टर और मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की। 

रिपोर्ट में लगातार लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का दबाव और रैगिंग जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया। यदि ये परिस्थितियां बार-बार सामने आ रही हैं, तो हमें इसे केवल व्यक्तिगत असफलता या व्यक्तिगत कमजोरी मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। अध्ययन में बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने नींद पूरी न होने, लगातार लंबी ड्यूटी और अत्यधिक तनाव की शिकायत की। कुछ डॉक्टरों ने आत्महत्या के विचार आने की बात भी स्वीकार की। ये आंकड़े महज आंकड़े नहीं हैं; ये हमारी चिकित्सा व्यवस्था के लिए चेतावनी हैं।

यह समस्या नई नहीं है। लगभग दो दशक पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में मेरे पिता के इलाज के दौरान मुझे स्वयं एक रेजिडेंट डॉक्टर के अत्यधिक तनाव और चिड़चिड़े व्यवहार का अनुभव हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार 25-30 घंटे तक ड्यूटी सामान्य बात मानी जाती थी। उस समय भी प्रश्न यही था कि इतनी लंबी ड्यूटी के बाद कोई चिकित्सक स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से कितना संतुलित रख सकता है? 

आज इतने वर्षों बाद भी यदि वही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, तो हमें ठहरकर सोचना होगा कि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कार्य-संस्कृति में वास्तविक परिवर्तन कितना आया है। चिकित्सकों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। वे प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होते हैं। गंभीर मरीजों की स्थिति, मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर प्रभाव डालते हैं।

इसे केवल प्रोफेशनल ड्यूटी कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि डॉक्टर को मजबूत होना चाहिए। निस्संदेह चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि उसे थकान, तनाव, भय या मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार ही न हो। डॉक्टर भी मनुष्य है। उसे भी पर्याप्त नींद, विश्राम, सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है।

इस संदर्भ में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम एवं प्रावधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नियमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन नियमों के जमीन पर उतरने से तय होती है। इस दिशा में कुछ संस्थागत कदम तत्काल प्रभाव से मजबूत किए जाने चाहिए।

  1. पहला, लंबी और लगातार ड्यूटी की नियमित समीक्षा हो तथा पर्याप्त विश्राम और शिफ्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
  2. दूसरा, मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए नियमित काउंसलिंग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था हो। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर स्वास्थ्य का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।
  3. तीसरा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के साथ मानसिक स्वास्थ्य की भी समय-समय पर स्क्रीनिंग की जाए।
  4. चौथा, प्रत्येक चिकित्सा संस्थान में प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र हो, जहां रैगिंग, उत्पीड़न, बुलिंग, अपमानजनक व्यवहार और अनुचित कार्यभार से जुड़ी शिकायतें सुरक्षित तरीके से दर्ज की जा सकें।
  5. पांचवां, मेंटोर-मेंटी सिस्टम को प्रभावी बनाया जाए। प्रत्येक जूनियर या रेजिडेंट डॉक्टर को ऐसा प्रशिक्षित फैकल्टी मेंटर मिले, जिसके साथ वह अकादमिक के साथ-साथ व्यक्तिगत और पेशेवर कठिनाइयों पर भी खुलकर संवाद कर सके।
  6. छठा, मरीजों और उनके परिजनों की तरह डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।
  7. सातवां, संस्थानों के नेतृत्व की जवाबदेही केवल परीक्षा परिणाम, शोध और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे। विभागाध्यक्ष और संस्थान के नेतृत्व को कार्यस्थल के वातावरण, कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-संस्कृति के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

सबसे बड़ा परिवर्तन शायद हमारी सोच में होना चाहिए। डॉक्टर को केवल सेवा प्रदाता मानने के बजाय हमें उसे एक संवेदनशील मनुष्य और प्रशिक्षित पेशेवर के रूप में देखना होगा। जो डॉक्टर दिन-रात दूसरों की धड़कन बचाने में लगा है, उसकी अपनी धड़कन को भी सुनना होगा। जो डॉक्टर मरीज से पूछता है— आपको कैसा महसूस हो रहा है? उसी तरह संस्थानों के अकादमिक और प्रशासनिक नेतृत्व को भी कभी-कभी डॉक्टर से पूछना चाहिए—आप कैसा महसूस कर रहे हैं? 

यह सवाल औपचारिकता नहीं, बल्कि संवेदनशील चिकित्सा व्यवस्था की पहचान होना चाहिए। हमें ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें चिकित्सक लंबे समय तक स्वस्थ, संवेदनशील और सक्षम रह सकें। आखिरकार मरीज की सुरक्षा और डॉक्टर का मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक स्वस्थ चिकित्सक ही बेहतर निर्णय ले सकता है, बेहतर संवाद कर सकता है और बेहतर चिकित्सा सेवा दे सकता है।

इसलिए डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की मूल आवश्यकता है। जो लोग दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनके जीवन की रक्षा करना केवल संस्थानों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। (लेखक अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र, बीएचयू वाराणसी के निदेशक हैं।)

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