- 15 सेकंड का दौर: क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी की सोच और भविष्य को खो रहे हैं?
डॉ नीता रजक
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल शाम मेज़ पर रखी कुछ पुरानी किताबों को देखकर मुझे अपनी एक छात्रा की बात याद आ गई, जिसने सहजता से कहा था कि मैम, आजकल इतनी मोटी किताबें कौन पढ़ता है, आप तो बस 15 सेकंड की रील बता दीजिए। यह बात सिर्फ एक बच्ची की सोच नहीं, बल्कि आज के पूरे समाज का सच बन चुकी है। एक शिक्षिका होने के नाते मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि हम बच्चों को किस तरफ ले जा रहे हैं।
क्या 15 सेकंड के टुकड़ों में बंटी यह दुनिया बच्चों के दिमाग के लिए सही है, या हम अनजाने में उनकी सोचने की ताकत और सब्र खो रहे हैं?जब भी रील्स के नुकसान पर बात होती है, लोग कहते हैं कि इससे युवाओं को कमाई का मौका मिल रहा है, तो बुराई क्या है। इंटरनेट ने कुछ बच्चों को हुनर दिखाने का मौका ज़रूर दिया है, पर गहराई से सोचने पर इसमें एक बड़ा धोखा नज़र आता है। क्या कुछ चुनिंदा युवाओं की कमाई के बहाने हम उन करोड़ों बच्चों का नुकसान भूल जाएं, जो वीडियो बनाते नहीं, बल्कि हर दिन 5-6 घंटे सिर्फ दूसरों के वीडियो देखते हैं? काम करने और लत में बड़ा फर्क है।
असल में कमाई करने वाले लोग बहुत मुट्ठी भर हैं, जबकि ज़्यादातर लोग अपना सबसे कीमती समय और सोचने की ताकत मुफ़्त में गँवा रहे हैं।यह 15 सेकंड का खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, इसके पीछे दिमाग का एक खेल चल रहा है। अगली रील में क्या आएगा, इसी उत्सुकता में हमारा मन बेचैन रहता है—बिल्कुल वैसे ही जैसे जुए में लोग बार-बार दांव लगाते हैं। नतीजा यह है कि बच्चों का दिमाग तुरंत खुशी पाने का आदी होता जा रहा है, और किसी कठिन बात को सब्र से समझने की ताकत धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
ज्ञान कोई फास्ट फूड नहीं जिसे 15 सेकंड में खा लिया जाए; वह एक पेड़ की तरह है जिसकी जड़ें गहरी होती हैं। जब नई पीढ़ी के पास किसी बात को पूरा समझने का समय ही नहीं होगा, तो बड़े डॉक्टर, वैज्ञानिक, लेखक या शिक्षक कैसे बनेंगे? अधूरी जानकारी से कभी बड़े विचार पैदा नहीं होते। हमारे रिश्ते भी रील की तरह नहीं होते कि पसंद न आए तो स्वाइप कर दिया जाए। रिश्तों को बचाने के लिए समय, सब्र और सुनने की आदत चाहिए, जो बच्चों में खत्म होती जा रही है।
साथ ही रील्स की दुनिया एक झूठी चमक-दमक वाली दुनिया है, जहाँ हर कोई कामयाब दिखने का नाटक करता है। इस झूठी चमक से अपनी तुलना करते हुए आज के युवाओं में चिड़चिड़ापन, घबराहट और उदासी तेज़ी से बढ़ रही है। एक शिक्षिका के तौर पर मैं साफ कहना चाहती हूँ कि यह दौर हमारी नई पीढ़ी की सोच और संस्कारों के लिए बिल्कुल सही नहीं है। जानकारी होने और सच्ची समझ होने में बहुत फर्क है—समझदारी हमेशा ठहरने और गहराई से सोचने से आती है।
पर इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो चुका है। बदलाव किसी बड़े नियम से नहीं, बल्कि अपने घर और स्कूल से शुरू होगा। दिन में एक-दो घंटे ऐसे रखें जब घर के सारे फोन बंद हों—उस समय किताबें पढ़ी जाएं या आपस में बातें की जाएं। इसके साथ ही बच्चों को खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना सबसे व्यावहारिक उपाय है। अगर स्कूलों में दिन की आखिरी क्लास खेल के लिए अनिवार्य कर दी जाए, तो बच्चों को मानसिक ताजगी मिलेगी और उनकी ऊर्जा सही दिशा में लगेगी।
जब बच्चा मैदान में पसीना बहाता है, तो उसका दिमाग स्क्रीन के नकली आकर्षण से हटकर वास्तविक दुनिया से जुड़ता है, और खेलों से अनुशासन व आगे बढ़ने का जज़्बा पैदा होता है। घर में माता-पिता भी बच्चों को बाहरी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें, तो मोबाइल से दूरी स्वाभाविक रूप से बनेगी। बच्चों को समझाना होगा कि मंजिल तक पहुँचने की असली खुशी पूरी यात्रा में है, 2 मिनट के रीकैप में नहीं। तकनीक हमारी सुविधा के लिए है, हमें उसका गुलाम नहीं बनना चाहिए।
आने वाले समय में सबसे सफल और शांत वही रहेगा, जिसका अपने मन और ध्यान पर काबू होगा। शिक्षकों और माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि बच्चों के हाथों में फिर से किताबें और खेल का सामान थमाएं, और उन्हें सिखाएं कि ज़िंदगी की असली कामयाबी 15 सेकंड की रील में नहीं, मन को शांत रखकर गहराई से सोचने और मेहनत करने में है। अपने ध्यान को बचाइए, क्योंकि जब हमारी एकाग्रता वापस आएगी, तभी हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा। (लेखिका देव संघ इंस्टिट्यूट ऑफ़ प्रोफेशनल स्टडीज एंड एजुकेशनल रिसर्च (डिपसर), देवघर की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)