Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 567
होम देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन
विचार

जब अर्जुन भी उलझ गये थे, तब कृष्ण ने रास्ता दिखाया

शेयर करें: WhatsApp Facebook X Back to ePaper
जब अर्जुन भी उलझ गये थे, तब कृष्ण ने रास्ता दिखाया
विज्ञापन

सारथी कृष्ण : भाग- 1 

विद्यार्थियों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का पहला पाठ- भ्रम से स्पष्टता की ओर 

प्रशांत झा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब हमारे सामने रास्ते तो बहुत होते हैं, लेकिन यह समझ नहीं आता कि जाना किस रास्ते पर है। मेहनत करने की इच्छा होती है, लेकिन मन साथ नहीं देता। लक्ष्य सामने होता है, लेकिन आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। कभी परीक्षा का डर, कभी करियर की चिंता, कभी माता-पिता की अपेक्षाएं और कभी दूसरों से आगे निकलने की होड़—इन सबके बीच विद्यार्थी कई बार भीतर से थक जाता है। ऐसा ही कुछ कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के साथ हुआ था। 

अर्जुन कोई कमजोर योद्धा नहीं थे। वे महान धनुर्धर थे, उन्होंने वर्षों तक प्रशिक्षण लिया था और युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार थे। लेकिन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले जब उन्होंने अपने सामने अपने ही संबंधियों, गुरुजनों और प्रियजनों को देखा, तो उनका मन विचलित हो गया। उनके हाथ से गांडीव छूटने लगा। यही स्थिति श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय- अर्जुन विषाद योग की शुरुआत है। और यहीं से सारथी कृष्ण की कहानी शुरू होती है। 

अर्जुन का विषाद वास्तव में क्या था? अर्जुन की समस्या केवल युद्ध की नहीं थी। उनकी असली समस्या थी—निर्णय का संकट। वे जानते थे कि उन्हें कुछ करना है, लेकिन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि सही क्या है। विद्यार्थी जीवन में भी ऐसी स्थिति बार-बार आती है। मुझे कौन-सा विषय लेना चाहिए? जेईई करूं या कोई दूसरा आजीविका चुनूं? मेरे अंक कम आ गये, क्या मैं सफल नहीं हो सकता? मेरे दोस्त मुझसे आगे निकल गये हैं, अब मैं क्या करूं? 

माता-पिता कुछ और चाहते हैं और मेरी रुचि कुछ और है- मैं क्या करूं? ये प्रश्न आज के अर्जुन के प्रश्न हैं। इसलिए गीता केवल हजारों वर्ष पुराना ग्रंथ नहीं है। उसमें मनुष्य की उस मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश है, जिसमें वह बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने भीतर के संघर्ष से परेशान होता है। 

पहला महत्वपूर्ण श्लोक: समस्या को देखना 

गीता के प्रारंभ में धृतराष्ट्र पूछते हैं- 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। 

मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ 

अर्थात्- कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया? यह केवल युद्धभूमि का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन का पहला पाठ है- समाधान से पहले समस्या को सही पहचानना आवश्यक है। आज विद्यार्थी अक्सर अपनी वास्तविक समस्या नहीं पहचान पाता। कम अंक समस्या नहीं, गलत अध्ययन-रणनीति हो सकती है। असफलता बुद्धिमत्ता की कमी नहीं, अभ्यास की कमी हो सकती है। एकाग्रता की कमी का कारण क्षमता नहीं, बल्कि मोबाइल और सोशल मीडिया भी हो सकते हैं। पहला पाठ यही है- अपनी समस्या को ईमानदारी से पहचानिए, क्योंकि सही समस्या की पहचान ही सही समाधान की पहली सीढ़ी है। 

अर्जुन का टूटना कमजोरी नहीं था 

जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने संबंधियों और गुरुजनों को सामने खड़ा देखते हैं, तो उनका मन विचलित हो जाता हैउनका शरीर कांपने लगता है, मुख सूख जाता है और विचारों में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। वे स्वयं कहते हैं मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है।अर्जुन की यह स्थिति कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय द्वंद्व का प्रतीक थी ,जीवन में ऐसे क्षण हर व्यक्ति के सामने आते हैं—परीक्षा हॉल के बाहर खड़े विद्यार्थी की बेचैनी, परिणाम आने से पहले का भय, साक्षात्कार से पहले की घबराहट या अपने भविष्य और आजीविका से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय मन में उठने वाला संशय। इन परिस्थितियों में डर और असमंजस होना स्वाभाविक है

 महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि मन कभी विचलित न हो, बल्कि यह है कि विचलन के बीच सही दिशा कैसे खोजी जाए यही अर्जुन से कृष्ण की यात्रा की शुरूआत है—और यही आज के विद्यार्थी के जीवन में भी प्रासंगिक है। गीता हमें यह नहीं कहती कि डरना गलत है। बल्कि वह दिखाती है कि डर और भ्रम की स्थिति में सही मार्गदर्शन कितना आवश्यक है। जब अर्जुन कहते हैं—मैं नहीं लड़ूंगा 

अर्जुन अंतत: अपना धनुष रख देते हैं और कहते हैं कि वे युद्ध नहीं करना चाहते। यही गीता का सबसे मानवीय क्षण है। एक महान योद्धा भी कभी-कभी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर निर्णय लेने में असमर्थ हो सकता है। इससे विद्यार्थियों को एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश मिलता है—भ्रम होना असफलता नहीं है; भ्रम में फंसे रहना समस्या है। यदि विद्यार्थी किसी विषय को लेकर परेशान है, तो उसे प्रश्न पूछना चाहिए। यदि आजीविका को लेकर भ्रम है, तो योग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना चाहिए। यदि किसी परीक्षा में असफलता मिली है, तो अपने प्रदर्शन का विश्लेषण करना चाहिए। सवाल पूछना कमजोरी नहीं है। 

यहीं से कृष्ण सारथी बनते हैं श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने व्याख्यान देने के लिए नहीं बैठे थे। वे पहले से अर्जुन के सारथी थे। लेकिन वास्तविक अर्थ में वे केवल रथ के सारथी नहीं, बल्कि अर्जुन की चेतना के सारथी बनते हैं। उन्होंने अर्जुन से यह नहीं कहा— तुम्हारी जगह मैं फैसला कर देता हूं। उन्होंने अर्जुन को सोचने, समझने और अपने कर्तव्य को पहचानने की दिशा दी। यही सारथी कृष्ण की मूल भावना है। 

आज के विद्यार्थी को भी एक ऐसे सारथी की आवश्यकता है। ऐसा सारथी जो उसे केवल यह न बताए कि क्या पढ़ो, बल्कि यह भी समझायें- क्यों पढ़ो? कैसे पढ़ो? असफल होने पर क्या करो? सफल होने के बाद कैसे व्यवहार करो? जीवन में सही निर्णय कैसे लो? 

पहले अध्याय का नाम विषाद योग है। पहली नजर में यह थोड़ा अजीब लगता है। विषाद यानी दुख, निराशा, मानसिक पीड़ा—और इसे योग क्यों कहा गया? क्योंकि अर्जुन का विषाद ही उन्हें ज्ञान की ओर ले जाता है। कभी-कभी जीवन की परेशानी हमें अपने बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है। 
असफलता हमें अपनी तैयारी समझाती है। गलत निर्णय हमें विवेक सिखाता है। भ्रम हमें सही मार्ग खोजने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए विद्यार्थी के जीवन में भी— हर परेशानी अंत नहीं होती; कई बार वही सही दिशा की शुरूआत होती है। 

आज का अर्जुन कौन है? 

आज का अर्जुन केवल वह विद्यार्थी नहीं है जो अच्छे अंक पाने का सपना देखता है, बल्कि वह हर विद्यार्थी है जो अपने भीतर की उलझनों से जूझ रहा है। वह विद्यार्थी भी अर्जुन है जो सफलता चाहता है, लेकिन पढ़ाई और अपेक्षाओं के दबाव में है। वह भी अर्जुन है जो अपने माता-पिता को गर्व महसूस कराना चाहता है, लेकिन अपने भविष्य की दिशा को लेकर भ्रमित है। वह विद्यार्थी भी अर्जुन है जो बार-बार असफल होने के बाद खुद से पूछता है- क्या मुझसे नहीं होगा? 

और वह भी अर्जुन है जिसके भीतर प्रतिभा और क्षमता तो भरपूर है, लेकिन सही दिशा का अभाव है। ऐसे समय में विद्यार्थी को केवल प्रेरणा की नहीं, बल्कि सही दिशा, अनुशासन, धैर्य और विवेक की आवश्यकता होती है। क्योंकि प्रतिभा सफलता की शुरूआत कर सकती है, लेकिन सही दिशा ही उसे मंजिल तक पहुंचाती है। यही वह क्षण है, जब हर विद्यार्थी को अपने भीतर के अर्जुन को पहचानने और अपने जीवन के सारथी की तलाश करने की आवश्यकता है। यही सारथी कृष्ण का संदेश है। 

विद्यार्थियों के लिए पांच सीख 

  1. पहली सीख — अपनी समस्या स्वीकार करो। दिखावा मत करो कि सब ठीक है। जहां समस्या है, उसे पहचानो। 
  2. दूसरी सीख — डर को निर्णय मत लेने दो। डर होना स्वाभाविक है, लेकिन निर्णय विवेक से होना चाहिए। 
  3. तीसरी सीख — सही व्यक्ति से मार्गदर्शन लो। हर समस्या का उत्तर अकेले खोजने की आवश्यकता नहीं है। 
  4. चौथी सीख — अपने कर्तव्य को पहचानो। विद्यार्थी का पहला धर्म ईमानदारी से सीखना, मेहनत करना और अपने चरित्र का निर्माण करना है। 
  5. पांचवीं सीख — परिणाम से पहले प्रक्रिया पर ध्यान दो। आज की मेहनत ही कल की उपलब्धि की नींव बनती है। 

जब मन भ्रमित हो, तब भागो मत। रुकिए, अपनी स्थिति को समझिए, सही प्रश्न पूछिए और सही मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़िए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के विचारों को सही दिशा दी आज आवश्यकता ऐसे विद्यार्थियों की है, जो केवल परीक्षा में सफलता के लिए नहीं, बल्कि जीवन को समझने के लिए भी पढ़ें! 

क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा परीक्षा-हॉल में नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों में होती है। वह परीक्षा तब होती है जब हमारे सामने कठिन परिस्थिति आती है और हमें तय करना होता है- अब मुझे क्या करना चाहिए? उस समय यदि हमारे भीतर विवेक, धैर्य और सही दिशा है, तो हम अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में भी आगे बढ़ सकते हैं। यही है पहला पाठ- अर्जुन बनिए, प्रश्न पूछिए; कृष्ण को अपना सारथी बनाइये।

विज्ञापन