डॉ. मयंक चतुर्वेदी
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी द्वारा देश के स्कूलों में बुरका-हिजाब पर प्रतिबंध लगाने और हर कक्षा में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने की घोषणा ने एक बार फिर वैश्विक पटल पर बुरका-हिजाब ला दिया है। वस्तुत: विश्व के कई देशों की सरकारों ने यह पाया है कि कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक पहचान के बीच इस्लाम से जुड़ी ये दो आदत आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे हवाई अड्डे, रेलवे स्टेशन, सरकारी बैंक और संवेदनशील इमारतें सीसीटीवी और फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) पर भारी पड़ रही हैं।
बुरका और हिजाब से चेहरा पूरी तरह ढक जाने के कारण किसी व्यक्ति की पहचान सत्यापित करना असंभव हो जाता है। श्रीलंका और कई अफ्रीकी देशों ने पाया है कि चरमपंथी और आत्मघाती हमलावर अपनी पहचान छिपाने और हथियारों की तस्करी के लिए बुरके का दुरुपयोग करते हैं, जिसके कारण सुरक्षा के लिहाज से कानून प्रवर्तन एजेंसियां सार्वजनिक स्थानों पर हर नागरिक का चेहरा खुला रखना अनिवार्य मानती हैं।
इसके अलावा, पश्चिमी देश, विशेषकर यूरोपीय राष्ट्र, एक बहुसांस्कृतिक समाज में प्रवासियों के पूरी तरह घुलने-मिलने पर जोर देते हैं। वैसे भी इंसानी बातचीत और सामाजिक जुड़ाव में चेहरे के हाव-भाव सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। चेहरा ढंके होने से बातचीत में एक अघोषित दीवार खड़ी हो जाती है, जो प्रवासियों को स्थानीय नागरिकों से अलग करती है। इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी के अनुसार, सच्चे एकीकरण का मतलब यह है कि प्रवासी देश की भाषा सीखें और वहां के सामाजिक ताने-बाने का सम्मान करें। बुरके को एक ऐसे सांस्कृतिक अलगाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है जो किसी समुदाय को मुख्यधारा के समाज में शामिल होने से रोकता है।
यूरोप के देश फ्रांस में लाइसीते (कट्टर धर्मनिरपेक्षता) का सिद्धांत लागू है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार के प्रमुख धार्मिक प्रतीकों (चाहे वह बड़ा इसाई क्रॉस हो, यहूदी टोपी हो, या मुस्लिम हिजाब/ बुरका हो) के प्रदर्शन पर रोक है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक क्षेत्र पूरी तरह से तटस्थ रहे। साथ ही, उदारवादी और नारीवादी विचारकों का एक बड़ा वर्ग बुरके और नकाब को पितृसत्तात्मक दमन का प्रतीक मानता है।
सरकार का तर्क है कि बहुत सी युवा लड़कियों और महिलाओं को उनके परिवारों या मजहबी संरक्षकों द्वारा अपनी इच्छा के विरुद्ध चेहरा ढंकने के लिए मजबूर किया जाता है, इसलिए प्रतिबंध लगाने वाले देशों का मानना है कि यह कानून उन महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करता है जो अपनी मर्जी से इसे नहीं पहनना चाहतीं। फ्रांस साल 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर बुरका और नकाब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बना था। इसके तुरंत बाद बेल्जियम ने भी यही राह चुनी।
स्विट्जरलैंड ने एक जनवरी 2025 से पूरे देश के सार्वजनिक स्थानों पर इसे प्रतिबंधित किया है, जबकि पुर्तगाल की संसद ने अगस्त 2026 में इस पर अपनी मुहर लगाई है। इसके अलावा आॅस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया और नीदरलैंड जैसे देशों में भी आंशिक प्रतिबंध लागू हैं। सिर्फ यूरोपीय देश ही नहीं, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों ने भी मजहबी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने और अपनी मूल धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की रक्षा के लिए स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब और बुरके पर कड़े नियम तय किए गए हैं।
यहां एक ओर बात ध्यान देने योग्य है कि शोध संस्था फोंडाजियोन आईएसएमयू के आंकड़ों से यह बात निकलकर सामने आई है कि इटली के स्कूलों में कुल नामांकित छात्रों में से लगभग 11.6 फीसद छात्र ऐसे हैं जिनके पास इटली की नागरिकता नहीं है, यानी हर 100 में से लगभग 12 छात्र विदेशी मूल के हैं। इस जनसांख्यिकीय बदलाव को देखते हुए, मेलोनी सरकार स्कूलों में चेहरा ढंकने पर रोक लगा रही है ताकि समानता दिखे, और प्रत्येक कक्षा में विदेशी छात्रों का कोटा तय कर रही है। स्थानीय इतालवी बच्चे अल्पसंख्यक महसूस न करें और प्रवासी बच्चे तेजी से इतालवी भाषा व संस्कृति सीख सकें।
इस तरह से इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखने पर यह बात साफ तौर पर पता चलती है कि इटली एवं अन्य यूरोपीय देश प्रवासियों को अपने समाज में शामिल करने के लिए भविष्य में ओर अधिक सख्त और कानूनी रूप से बाध्यकारी नीतियां अपनायेंगे, जिसमें पहनावे से लेकर भाषा सीखने तक की शर्तें शामिल होंगी। फिलहाल, इटली इस निर्णय को अपने हित में देख रहा है। पीएम जॉर्जिया मेलोनी बुरका और हिजाब मामले में निर्णय लेने को लेकर सख्त नजर आ रही हैं।
दूसरी ओर भारत जैसे देश हैं, जहां बरका और हिजाब को लेकर सामुदायिक पहचान को इतना अधिक तूल दिया जा रहा है कि समानता के स्तर पर विद्यालयों एवं महाविद्यालयों तक में विवाद खड़े किए जा रहे हैं, जिसमें कि हस्तक्षेप के लिए कानून और संविधान की दुहाई देते हुए न्यायालय में बार-बार प्रकरणों को लेकर जाया जा रहा है! कहने को भारत में इस्लाम को माननेवाले अल्पसंख्यक कहलाते हैं, किंतु ये अल्पसंख्यक आज उन तमाम इस्लामिक देशों से भी कुछ सीखना नहीं चाहते, जहां ये बहुसंख्यक होने के बाद भी अपने इस्लामिक रिपब्लिक में सुरक्षा एवं अन्य कारणों के चलते हिजाब एवं बुरका पर पूरी तरह बैन लगा हुआ है!