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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं संवेदनशील

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं  संवेदनशील
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अश्लेष कुमार पांडेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज 5 सितंबर को प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरे देश में भारत के महान दार्शनिक, शिक्षक, प्रथम उपराष्ट्रपति एवं देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को समाज एवं राष्ट्र निर्माता रूपी पद शिक्षक को समर्पित शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। अत: राष्ट्र के सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!  

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:। 

गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:।। 

इन पंक्तियों के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र के समस्त प्रबुद्ध नागरिक को अवगत कराने  की आवश्यकता नहीं है, कि गुरु का स्थान गोविंद अर्थात नारायण से भी बढ़कर है। वर्तमान समय से लगभग 60 वर्ष पूर्व भी शिक्षक दिवस मनाया जाता था किंतु जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया इस दिवस को मनाने की पद्धति भी बदलती गयी। 

जहां पूर्व में गुरुकुल से लेकर विद्यालय में चकूचंदा प्राप्त कर विद्यार्थी शिक्षक दिवस मनाते थे। वहीं आज डिजिटल जमाने में अन्य कार्यक्रम को व्यवस्थित कर विद्यार्थी शिक्षकों का सम्मान देते हैं। गुरु शिष्य की परंपरा इस राष्ट्र की संस्कृति का एक अहम और पवित्र रिश्ता है, जिसका कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 

शिक्षक व्यक्ति ही नहीं  मार्गदर्शक के साथ-साथ प्रेरक एवं जीवन का सच्चा मित्र होता है। शिक्षक प्रत्येक परिस्थिति में समस्या से संघर्ष करना एवं असफलताओं से सीखने की प्रेरणा देता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का एक कथन है कि एक वकील की गलती फाइलों में दब जाती है, एक इंजीनियर की गलती दीवार की र्इंट में पीछे छुप जाती है, एक डॉक्टर की गलती कब्रिस्तान में दफन हो जाती है। 

लेकिन एक शिक्षक की गलती सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में स्पष्ट रूप से झलकती है। इसीलिए कहा गया है कि असफलता ही सफलता की कुंजी है और इसी को मानकर एक महान शिक्षक हमेशा विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता है। शिक्षा का अर्थ ही होता है, जो मस्तिष्क को ऊर्जा दे, हृदय को करुणा दे और हाथ को हुनर दे। शिक्षक हमेशा इन पंक्तियों में विश्वास करता है कि 

राहें जहां तक जायेगी, राहगीर वहां तक जायेगा। 

तुम दरिया से क्या पूछते हो, नीर कहां तक जायेगा? 

अरे! खींच धनु की डोर, निशाना साध अपनी मंजिल का, 

बाकी बाद में देखेंगे की तीर कहां तक जायेगा।।  

वर्तमान समय में प्राय यह देखा जा रहा है कि प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस सिर्फ एक दिन के लिए समाचार पत्र एवं टीवी न्यूज चैनल से दिये गये संदेश आम जनों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिस उद्देश्य से अपने जन्मदिन को शिक्षक के लिए समर्पित किये थे वह कहीं ना कहीं आज अधूरा सफल साबित हो रहा है। चाहे इस कार्य के लिए विद्यार्थी, अभिभावक, समाज के प्रबुद्ध जन एवं स्वयं शिक्षक ही जिम्मेवार क्यों न हो? 

वर्ष के शेष 364 दिन शिक्षक सम्मान न पाकर अधिकांश शिक्षक अपमान ही महसूस कर रहे हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार, समाज के प्रबुद्ध जन के साथ-साथ विद्यार्थी, विद्यालय प्रबंधन एवं शिक्षक ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला चरम सीमा तक  पहुंच गया है जिसमें विद्यार्थी प्रांत से लेकर राष्ट्र स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है कि ऐसा क्यों?

सरकार किसी भी पार्टी की हो मगर सत्य बात तो यह है कि किसी ने शिक्षा को अपनी प्रथम श्रेणी में नहीं रखा। आजादी से लेकर आज तक लगभग 80 वर्षों के सफर में शिक्षा का हाल तो ऐसा हुआ है की शिक्षक ही इसे अच्छी तरह समझ रहे हैं। सरकार एवं विद्यालय प्रबंधन की मंंशा एवं उनके कार्य के प्रति क्या है? यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। आजादी के बाद भी सरकारी विद्यालय का संचालन एक या दो शिक्षकों के माध्यम से किया जा रहा है। 

इससे बच्चों का विकास कैसे कराया जा सकता है, यह मेरे 28 वर्षों के अध्यापन कार्य में समझ से परे है। आज विकसित राष्ट्र जहां शिक्षा एवं अध्यापक पर बजट एवं सुविधा का ख्याल जितना रखता है वहीं मेरे देश में इसे सामान्य श्रेणी में रखा जा रहा है। इसका तात्कालिक उदाहरण नवनियुक्त शिक्षकों के वर्तमान समय में वेतन की कमी को देखकर लगाया जा सकता है की सरकार कितना जागरूक है। 

जहां तक मान्यता प्राप्त एवं निजी विद्यालय के प्रबंधन को देखा जाये तो गिने चुने संगठन के अंतर्गत संचालित विद्यालय को छोड़कर शेष सभी प्रबंधन शिक्षकों का शोषण करने में कमी नहीं कर रहे हैं। इसका एक ही मुख्य कारण है-शिक्षित बेरोजगारी। निजी विद्यालय जो मान्यता प्राप्त नहीं है वेअप्रशिक्षित शिक्षकों को विद्यालय में रखकर अपने मनोनुकूल कार्य करा कर अपना अर्थ उपार्जन तो कर रहे हैं किंतु इसका प्रभाव समाज एवं विद्यार्थियों पर पड  रहा है, जिससे शिक्षक समाज में कहीं न कहीं अपने आप को वंचित महसूस कर रहे हैं। 

अनावश्यक कार्य तो शिक्षकों पर इतने डाल दिये गये हैं कि वे बच्चों को पढाने की जगह अपनी नौकरी बचाने के लिए पूरे दिन कागजी कार्रवाई में लगे रहते हैं। वर्तमान समय में तो निजी विद्यालय भी इससे अलग नहीं रहा है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तो असफल ही साबित होगी चाहे सरकार बंद ए सी कमरे में कितनी भी नीति क्यों ना तैयार कर लें। इन सभी नीतियों से एक ही अर्थ निकलता है कि जब कार्य पद के अनुसार पूर्ण रूप से नहीं करेंगे तो शिक्षक को कैसे सम्मान मिल पायेगा। 

इसके कारण ही वर्तमान समय में शिक्षक अपने आप को ठगा हुआ महसूस पा रहा है एवं प्रत्येक जगह अपमानित हो रहा है। अत: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान एक अत्यंत ही संवेदनशील और विचारणीय विषय बन चुका है। प्राचीन काल में शिक्षक को गुरु मानकर ब्रह्मा एवं विष्णु के भाव से जहां सर्वोच्च स्थान दिया गया जाता था। वहीं आज की आधुनिक व्यवसाय और डिजिटल युग में शिक्षक और समाज की परिभाषा में गहरा बदलाव आया है।

इस समय शिक्षकों के सम्मान में बदलते परिप्रेक्ष्य में मुख्य रूप से शिक्षा का व्यवसायीकरण, तकनीकी और इंटरनेट का प्रभाव, अतिरिक्त  शैक्षणिक कार्य, अभिभावक के शिकायती रवैया एवं पदाधिकारी द्वारा अपमानित करना एक चुनौतियां बन गया है। इस बदलते परिवेश  में विद्यार्थी उसी शिक्षक को सम्मान करते हैं जो सिर्फ किताबी ज्ञान न देकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझता है एवं करियर काउंसलिंग कर मित्र की तरह व्यवहार करता है। 

इस बात से अलग नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान समय में कुछ शिक्षकों द्वारा विद्यालय एवं समाज में ऐसे कृत्य कर  रहे हैं जो शोभनीय ही नहीं बल्कि अपने पद को कलंकित कर रहे  हैं। प्राय:यह समाचार पत्र के माध्यम से देखने को मिलता है जिसका मुख्य कारण अपरिपक्वता एवं अनुभवहीनता भी है। ऐसे शिक्षकों से मेरा करवद्व प्रार्थना है कि आपके अंदर यदि ऐसी प्रवृत्ति हो तो शिक्षक एवं समाज हित में अपने पद से त्यागपत्र देकर किसी अन्य  रोजगार में योगदान दें, जिससे शिक्षकों का मान सम्मान बना रहे। 

अत: मैं समाज एवं देश के सभी आमजनों से आह्वान करता हूं की राष्ट्र निर्माण में लगे शिक्षक समाज की नीव होते हैं। अत: नैतिकता और मूल्यों के संरक्षण मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए शिक्षक को वेतन भोगी कर्मचारी ना मानते हुए इतना सम्मान दें ताकि भविष्य में समाज की नीव को मजबूत बनाते हुए राष्ट्र को विकसित करने में अपना ईमानदारी पूर्वक योगदान दे सकें। (लेखक रोटरी स्कूल, चैनपुर पलामू के प्राचार्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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