त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सामान्य जीवन में गुरु, माता-पिता एवं ईस्ट देवी देवता भगवान की कृपा, आशीर्वाद तथा वरदान की आकांक्षा सभी को रहती है; यहां तक कि सांसारिक जीवन में किसी उच्च शक्तिशाली व्यक्ति की कृपापात्र बनने की अपने-अपने नफा नुकसान के गणित से प्रयास किया जाता है।
प्रश्न है कि भौतिक अथवा आध्यात्मिक आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए क्या किया जाये। सबसे पहले तो किसी बड़े अधिकारी/पदाधिकारी के पास जाना होता है। तीर्थ स्थान मंदिर देवालय जाने के पीछे का उद्देश्य नजदीक पहुंचना ही होता है। सान्निध्य बनाये बिना आदान-प्रदान की क्रिया असंभव तो नहीं है लेकिन सरल भी नहीं है।
प्रकृति के प्रत्येक अवयव का एक अपना विशेष प्रभाव मंडल एवं प्रभाव होता है जिसकी अनुभूति उसके सानिध्य में आने के उपरांत ही हो पता है। समुद्र एवं नदी का अपना-अपना प्रभाव मंडल होता है जिसकी अनुभूति तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके नजदीक में जाया जाये, इसी प्रकार गांव शहर जंगल पहाड़ इत्यादि इत्यादि के अपने-अपने विशेष प्रभा मंडल होते हैं और उसका प्रभाव पानी के लिए उनके आसपास होना आवश्यक होता है।
गुरु माता-पिता एवं ईश्वर का आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए उनका सान्निध्य नितांत आवश्यक है। दूर-दूर से काम नहीं बनने वाला है। अपनी चेतना भावना संवेदना बुद्धि विवेक श्रद्धा भक्ति विश्वास; अपने निवेदन एवं प्रार्थना में व्यापक करना पड़ता है।
यही तो तप एवं तपस्या है, और सबको सामान्य रूप से पता होता है कि भोजन बनाने के लिए अनाज एवं सब्जी को अग्नि में पकाना पड़ता है। आजकल अनुग्रह प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के ड्रामा और नौटंकी किये जाते हैं जिनका फल-प्रतिफल और परिणाम नहीं प्राप्त होने से आस्था एवं विश्वास टूट जाते हैं।
पहले सान्निध्य बनाया जाये, समर्पण प्रस्तुत किया जाए, निवेदन एवं प्रार्थना अर्पित किया जाए तो किसी का भी आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त किया जा सकता है.. और इसके लिए प्रथम एवं अंतिम शर्त यही होता है कि अपनी पात्रता को विकसित किया जाये। हर-हर महादेव...