त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वैसे तो देवाधिदेव महादेव की विशेष पूजा, अर्चना, प्रार्थना, समर्पण एवं सानिध्य प्राप्त करने के लिए सोमवार का दिन शुभ मुहूर्त माना गया है।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देव शयनी एकादशी) को सृष्टि के संचालक श्रीहरि भगवान विष्णु चातुर्मास के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में तल्लीन हो जाते हैं तथा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के एकादशी को उनकी योगनिद्रा भंग होती है। इन चार महीना में सृष्टि के संचालन का कार्य भगवान शंकर के द्वारा की जाती है; इसीलिए इन दिनों महादेव समाधि की अवस्था से जागृत अवस्था में क्रियाशील रहते हैं।
कांवड़ यात्रा करते हुए महादेव को जलार्पण तपस्या की श्रेणी में आता है। सात्विक भोजन, एकांत, मौनव्रत (यथासंभव अनावश्यक बहस से बचाना), महादेव के सानिध्य की अनुभूति, और उनसे आशीर्वाद तथा वरदान मांगना भक्तों के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
श्रावण मास के अतिरिक्त चातुर्मास में महादेव की कृपापात्र बनाना अन्य दिनों के तुलना में सरल है। इन दिनों भक्त/साधक के लिए ईश्वरीय शक्ति से जुड़ना थोड़ा सहज हो जाता है और तपस्या का पुरुषार्थ उसकी आदत बन जाती है और यही आदत भविष्य में उसे सब प्रकार के सफलता एवं समृद्धि का आधार बन जाता है। हर-हर महादेव...