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हाथी की मस्ती के जैसी मोदी जी की चाल...

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हाथी की मस्ती के जैसी मोदी जी की चाल...
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त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाजार में हाथी जब चल रहा होता है तब गांव के बड़े-बूढ़े हाथी को प्रणाम करते हैं, बच्चों से प्रणाम करवाते हैं और हाथी का दर्शन करके लोग स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं; यह हाथी के आगे का दृश्य होता है। गांव भर के कुत्ते इकट्ठा होकर हाथी के पीछे-पीछे चलते हुए भौंकते रहते हैं ; हाथी के पीछे का एक दृश्य यह भी होता है। 

गांव भर के श्रद्धालु  

हाथी के आगे खड़े होंगे,  

गांव भर के कुत्ते  

हाथी के पीछे पड़े होंगे 

समझना बड़ा कठिन है कि आखिर कुत्तों को हाथी से चिढ़ क्यों होती है? हाथी से वे मुकाबला कर नहीं कर सकते, आकार के गणित से सारे भौंकते कुत्ते हाथी के पेट में समा सकते हैं। किसी ने कुत्तों से पूछा की भाई तुम लोगों को हाथी से  क्या परेशानी है, तो कुत्तों ने कहा कि हमें इस बात से दिक्कत है कि हाथी के आगे कुछ लोग खड़े होकर उसे सम्मान क्यों दे रहे हैं और जब हमारी बारी आती है तो हमें लाठी से दुत्कार दिया जाता है। 

अपनी मस्ती में हाथी  

आगे बढ़ता जाता है  

भौंकने वाले कुत्तों को  

पीछे मुड़कर देखता नहीं  

प्रशंसा कर रहे आगे खड़े  

लोगों के सामने रुकता नहीं 

निंदा एवं प्रशंसा से दूर अपने लक्ष्य की ओर हाथी आगे ही आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति के लिए निंदा एवं प्रशंसा में कोई अंतर नहीं रह गया हो, राग वैमनस्य से परे हो गया हो, विवेक की सक्रियता उसका साथ दे रहा हो; वह मनुष्य अपने लक्ष्य की ओर आगे ही आगे बढ़ता जाता है और उद्देश्य को परिणाम में परिवर्तित करते फिर नई लक्ष्य की ओर आगे निकल जाता है।

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