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संपर्क और सान्निध्य...

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संपर्क और सान्निध्य... 

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल गुरु पूर्णिमा की तिथि थी। बधाई एवं शुभकामनाओं वाले स्टीकर से सोशल मीडिया अटे-पटे थे; मैंने उन संदेशों के ऊपर बहुत ध्यान दिया और विश्लेषण किया कि मेरे व्यक्तित्व में कितना प्रभाव हुआ? 

मैंने पाया कि बात आई राम गई राम हो गई। किसी एक व्यक्ति के एक जीवन में अनेक गुरुओं से संपर्क एवं सानिध्य प्राप्त होता है। प्रथम तो माता-पिता परिवार एवं समाज के सानिध्य में व्यक्ति आता है और उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व के ज्ञान विज्ञान कला साहित्य बुद्धि विवेक के ऊपर  सीधा असर डालता है। 

विद्यार्थी जीवन से लेकर आगे के जीवन में भी कई प्रकार के गुरुओं का सानिध्य प्राप्त होता है और उसका लाभ व्यवहारिक जीवन के लिए बहुमूल्य हो जाता है। यह भी होता है कि प्रत्यक्ष स्वरूप में गुरु का संपर्क एवं सानिध्य नहीं मिल पाता हो, परंतु उनका स्मरण मन, मस्तिष्क एवं भावना में सूक्ष्म रूप से क्रियाशील होते हुए संपर्क एवं सानिध्य का कार्य करते रहता है। 

गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य से हर किसी की इच्छा होती है कि गुरु उसे वह सब कुछ दें जो गुरु के पास होती है। गुरु तो गुरु ही होते हैं, देने के पहले शिष्य की पात्रता का गहन निरीक्षण परीक्षण गुरु महाराज की प्राथमिकता होती है। 

गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य में जाने से पहले अपनी पात्रता के विषय में भलीभांति जान लेना ही एक श्रेष्ठ शिष्य का दायित्व होता है। सांसारिक/भौतिक जीवन में गुरु का प्रभाव परिलक्षित होते रहता है। लोगबाग अमुक व्यक्ति के व्यवहार से समझ जाते हैं कि व्यक्ति का गुरु कैसा रहा होगा। आध्यात्मिक जीवन में गुरु महाराज का महत्व सबसे ज्यादा होता है।

मोटे तौर पर अध्यात्म का अर्थ ईश्वरीय अनुकंपा से जोड़कर देखा जाता है; जबकि ईश्वर की अनुकंपा के लिए स्वयं ही पुरुषार्थ करने का विधान है। गुरु महाराज के सानिध्य एवं संपर्क से चेतना भावना संवेदना बुद्धि  विवेक एवं अनुशासन इत्यादि का शोधन परिशोधन तो हो जाता है, परंतु व्यवहार में संतुलन एवं साधना का मार्ग स्वयं ही तय करना होता है। 

सांसारिक उपलब्धि तथा आध्यात्मिक उपलब्धि दोनों में निर्मित व्यक्तित्व ही परिणाम उत्पन्न करता है। वास्तव में गुरु की कृपा व्यक्तित्व निर्माण के स्वरूप में ही प्राप्त होती है। गुरु के पास जाने, उनसे संपर्क एवं सानिध्य साधने के लिए श्रद्धा भक्ति एवं विश्वास की पूंजी होनी ही चाहिए।

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