- परिसीमन विधेयक और लोकसभा...
त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अभी 3 महीना पहले लोकसभा में परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) मात्र 54 वोटों की कमी के कारण गिर गया था, लेकिन अब जब लोकसभा का मानसून सत्र शुरू हो गया है तब लोकसभा के सदन में पक्ष एवं विपक्ष सांसदों की संख्या के परिदृश्य में भारी बदलाव हो चुका है।
डीलिमिटेशन बिल लोकसभा में पारित नहीं होने देने के बाद विपक्षी गठबंधन में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के पहले तक एक नई उम्मीद जगी थी, परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद देश की राजनीति का तस्वीर एवं तेवर में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के संसद में से 20 सांसदों के बगावत और सदन में विपक्ष से अलग बैठने की स्थिति के कारण सत्तापक्ष को फायदा हुआ है। उद्धव ठाकरे के शिवसेना से 6 संसद के बगावत करके एकनाथ शिंदे के शिवसेना में चले जाने से लोकसभा में सत्ता पक्ष को मजबूती मिल रहा है।
महाराष्ट्र के शरद पवार के एनसीपी के 8 सांसद परिवर्तन के मार्ग में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। 22 सांसदों वाली डीएमके लोकसभा में विपक्षी खेमा से अलग बैठने का फैसला ले लिया है, क्योंकि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद डीएम के के संबंध कांग्रेस से टूट चुके हैं। डीएमके के नेता एमके स्टालिन का सभी राज्यों में 50% सीटों बढ़ोतरी के मुखर विरोध का मिजाज ठंडा पड़ चुका है।
इस मानसून सत्र के एजेंडा में परिसीमन विधेयक का नहीं होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि मोदीजी की सरकार ने इस विधेयक के बारे में सोचना बंद कर दिया है अथवा लोकसभा में विपक्ष की ताकत का उसे अंदाजा नहीं है। जब कभी सत्ता पक्ष को यह समझ में आ जाएगा कि टू थर्ड मेजोरिटी से लोकसभा में डीलिमिटेशन बिल पास कराया जा सकता है, सरकार एक बार फिर विशेष सत्र बुलाकर इसे पारित करा सकती है। (लेखक स्वतंत्र स्तम्भ कार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)।