- रिश्ते अब मटेरियलिस्टिक हो गये हैं...
- क्या बुजुर्गों का सम्मान भी आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो गया है?
डॉ. दीपक प्रसाद
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके बुजुर्गों के प्रति व्यवहार से होती है। जिस समाज में वृद्धों का सम्मान, सुरक्षा और स्नेह बना रहता है, वह समाज सांस्कृतिक रूप से समृद्ध माना जाता है। किंतु आज का बदलता सामाजिक परिवेश एक अत्यंत चिंताजनक प्रश्न हमारे सामने खड़ा करता है क्या रिश्ते अब केवल आर्थिक लाभ और भौतिक स्वार्थ तक सीमित हो गए हैं? क्या परिवार में बुजुर्ग का सम्मान अब इस बात से तय होने लगा है कि उन्हें पेंशन मिलती है या नहीं?
यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय चेतना से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों को देवतुल्य माना गया है। मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव: केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। संयुक्त परिवार की परंपरा में दादा-दादी और नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और जीवन-मूल्यों के संरक्षक होते थे।
आज वही बुजुर्ग अपने ही घर में स्वयं को उपेक्षित, अकेला और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आज समाज में एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है जो अत्यंत पीड़ादायक है। यदि किसी बुजुर्ग को नियमित पेंशन मिलती है, तो उसके साथ रहने और उसकी सेवा करने के लिए कई लोग तैयार दिखाई देते हैं। लेकिन जिस बुजुर्ग के पास कोई आय नहीं है, वही व्यक्ति धीरे-धीरे परिवार पर बोझ समझा जाने लगता है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के क्षरण का संकेत है।
क्या सचमुच रिश्तों का मूल्य अब बैंक खाते से तय होगा? क्या माता-पिता का सम्मान उनकी पेंशन, संपत्ति और बचत के आधार पर होगा? यदि ऐसा है, तो यह केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की नैतिक पराजय है।
बुजुर्ग जीवन के उस पड़ाव पर होते हैं जहां उन्हें सबसे अधिक प्रेम, धैर्य, सम्मान और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। वे फिर से बच्चों की तरह हो जाते हैं। उन्हें समय चाहिए, अपनापन चाहिए, बातचीत चाहिए और यह विश्वास चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन की भागदौड़, उपभोक्तावाद और स्वार्थपरक सोच ने इन मानवीय आवश्यकताओं को पीछे छोड़ दिया है। आज का युवा वर्ग अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है- रोजगार, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली। इन परिस्थितियों को नकारा नहीं जा सकता। किंतु इन चुनौतियों के बीच यदि परिवार के सबसे अनुभवी सदस्य ही उपेक्षा के शिकार हो जाएँ, तो यह विकास अधूरा है। आधुनिकता का अर्थ अपने मूल्यों को त्याग देना नहीं है।
तकनीकी प्रगति और आर्थिक सफलता तभी सार्थक है जब उसके साथ मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहें। एक पुरानी कहावत है एक बुजुर्ग चार बच्चों का पालन-पोषण कर सकता है, लेकिन कई बार चार बच्चे मिलकर भी एक बुजुर्ग की सेवा नहीं कर पाते। यह केवल कहावत नहीं, बल्कि आज के समाज की कड़वी सच्चाई बनती जा रही है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपना सुख, समय, स्वास्थ्य और सपने तक न्योछावर कर देते हैं।
वृद्धावस्था में जब उन्हें सहारे की आवश्यकता होती है, तब यदि उन्हें सम्मान के स्थान पर उपेक्षा मिले, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी परिवार ऐसे नहीं हैं। आज भी असंख्य युवा अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं, उन्हें सम्मान दे रहे हैं और अपने बच्चों को भी यही संस्कार सिखा रहे हैं। ऐसे परिवार समाज के लिए प्रेरणा हैं। इसलिए उद्देश्य किसी एक पीढ़ी को दोष देना नहीं, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है।
सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से सहयोग कर रही हैं, परंतु कोई भी योजना उस आत्मीयता का स्थान नहीं ले सकती जो परिवार दे सकता है। आर्थिक सहायता आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और अपनापन। आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों में संवाद बढ़े, बच्चों को बचपन से ही बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संस्कार दिया जाए और समाज यह समझे कि माता-पिता कोई आर्थिक निवेश नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की जड़ें हैं।
यदि रिश्ते केवल लाभ-हानि के तराजू पर तौले जाने लगे, तो परिवार केवल एक साथ रहने का स्थान रह जाएगा, घर नहीं। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि क्या हम भी अनजाने में रिश्तों को मटेरियलिस्टिक बना रहे हैं? क्या हम अपने माता-पिता के साथ वही व्यवहार कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा हम अपने बच्चों से भविष्य में करेंगे? समय का चक्र सबके लिए समान है। आज जो युवा है, वह कल बुजुर्ग होगा।
अंतत: यही कहा जा सकता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि उसकी ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या बढ़ती आय से नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों के चेहरे पर दिखने वाली संतुष्टि और सम्मान से आंकी जाती है। यदि हमारे घरों में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और प्रसन्न हैं, तभी हमारा विकास वास्तविक है। रिश्तों को धन से नहीं, मन से जोड़िये। पेंशन से नहीं, प्रेम से पहचानिए। क्योंकि धन जीवन को सुविधाएं दे सकता है, परंतु केवल अपनापन ही जीवन को गरिमा दे सकता है। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर सांस्कृतिक शोधकर्ता, चिन्तक एवं रंगनिर्देशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)