हजारीबाग से उठी चुनौती, वर्षों तक बेचैन रहा ब्रिटिश प्रशासन 30 जून : हूल दिवस पर विशेष
डॉ शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 30 जून को देश संताल हूल दिवस मनाता है। अधिकांश स्मरण 1855 के भगनाडीह और सिदो-कान्हू, चांद तथा भैरव मुर्मू के नेतृत्व में फूटे उस महान विद्रोह तक सीमित रह जाते हैं, जिसने अंग्रेजी शासन को आदिवासी भारत की संगठित शक्ति का परिचय कराया। किंतु हूल केवल एक दिन, एक वर्ष या एक क्षेत्र की घटना नहीं था। उसकी ज्वाला दामिन-ए-कोह से निकलकर छोटानागपुर, विशेषकर हजारीबाग की धरती पर लंबे समय तक धधकती रही। हूल का वास्तविक इतिहास उसकी निरंतरता में छिपा है।
हूल के दमन के बाद बड़ी संख्या में संताल योद्धाओं और नेताओं को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि नेतृत्व को कैद कर देने से प्रतिरोध समाप्त हो जायेगा। लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह विश्वास टूट गया। अप्रैल 1856 में सैकड़ों संताल अपने बंदी साथियों को मुक्त कराने के लिए हजारीबाग जेल पर टूट पड़े। जेल भवन में आग लगा दी गई। जेल अस्पताल, मालखाना और संतरी चैकी पर तीरों की बौछार हुई। प्रशासन ने पहले इसे कुछ बरकंदाजों की शरारत मानकर टालना चाहा, किंतु शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह किसी छोटे समूह की दुस्साहसिक घटना नहीं, बल्कि जीवित प्रतिरोध की उद्घोषणा थी। संताल अपने नेताओं को मुक्त नहीं करा सके, पर अंग्रेजी शासन को यह संदेश अवश्य दे गए कि हूल अभी जिंदा है।
लगभग एक वर्ष बाद वही हजारीबाग फिर इतिहास के केंद्र में था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब विद्रोही सैनिकों ने जेल पर धावा बोला और फाटक तोड़ा, तब सबसे बड़ी संख्या उन संताल बंदियों की थी जिन्हें हूल और उसके पहले और बाद के संघर्षों में कारावास मिला था। जेल से बाहर निकलते ही वे अपने गाँवों और समुदायों में लौटे। उन्होंने एक बार फिर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियार उठा लिए। इस प्रकार हूल और 1857 का महासमर हजारीबाग की धरती पर एक-दूसरे से जुड़ गए।
अब संघर्ष का स्वरूप भी बदल चुका था। यह केवल हथियारों का प्रतिरोध नहीं रहा। संतालों ने फसल-दखल आंदोलन आरंभ किया। जिन जमींदारों और महाजनों को वे अंग्रेजी शासन का सहायक मानते थे, उनके खेतों से अनाज अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। रूपु मांझी के नेतृत्व में यह आंदोलन गोला, चितरपुर, गोमिया, पेटरवार, चास और मानभूम तक फैल गया। यह केवल अन्न प्राप्त करने का प्रयास नहीं था, यह उस भूमि पर अधिकार की घोषणा थी जिसे संतालों अपने श्रम से उपजाऊ बनाया था।
इन घटनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता को चरम पर पहुंचा दिया। उनका भय था कि यदि संताल ग्रैंड ट्रंक रोड तक पहुंच गए या उसे पार कर गए, तो कलकत्ता और उत्तर भारत के बीच साम्राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण संपर्क मार्ग संकट में पड़ जाएगा। इसी आशंका में बगोदर और बरही के बीच सैनिक बढ़ाये गये, यूरोपीय और सिख सैनिकों की टुकड़ियां भेजी गयीं, टेलीग्राफ कार्यालय को बगोदर से बरही स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया और शेरघाटी में कटते तारों की खबरों ने औपनिवेशिक शासन के होश उड़ा दिये थे।
यह केवल सुरक्षा-व्यवस्था नहीं थी, यह उस भय का प्रमाण था, जो संताल प्रतिरोध ने औपनिवेशिक शासन के भीतर पैदा कर दिया था। उधर रूपू मांझी और उनके साथियों की गतिविधियां रुक नहीं रही थीं। ब्रिटिश समर्थक जमींदार उनके निशाने पर थे। गांवों में अनाज जब्त किया जा रहा था। राजा रामगढ़ स्वयं चिंतित थे और अतिरिक्त सैनिकों की मांग कर रहे थे। अंतत: अंग्रेजी शासन ने स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों, सिख सैनिकों और यूरोपीय टुकड़ियों की सहायता से व्यापक सैन्य अभियान चलाया। गांव जलाये गये, नेताओं के घर नष्ट किए गए, इनाम घोषित हुए और सैकड़ों संताल एक बार फिर से गिरफ्तार किये गये। तब जाकर यह प्रतिरोध धीरे-धीरे दबाया जा सका।
हूल दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, यह इतिहास को उसकी संपूर्णता में समझने का भी दिन है। यदि हम हूल को केवल 30 जून 1855 की घटना मानते हैं, तो उसके सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। हजारीबाग जेल पर हमला, 1857 के महासमर में संताल बंदियों की निर्णायक भूमिका, फसल-दखल आंदोलन और ब्रिटिश शासन की बढ़ती प्रशासनिक घबराहट इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि हूल ने औपनिवेशिक सत्ता को वर्षों तक चुनौती दी। संताल हूल भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का केवल प्रारंभिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस दीर्घ प्रतिरोध परंपरा का आधार स्तंभ है, जिसने अंतत: विदेशी शासन की जड़ों को हिला दिया। आज हूल दिवस पर उन ज्ञात-अज्ञात संताल वीरों को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उनके संघर्ष को इतिहास के सीमित अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता चेतना की सतत् और जीवंत धारा के रूप में देखा जाए। (लेखक इतिहास के प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।)