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रुपया, ज्ञान, संपर्क एवं क्रिया...

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रुपया, ज्ञान, संपर्क एवं क्रिया...
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रुपया, ज्ञान, संपर्क एवं क्रिया...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल एक प्रचलन प्रसिद्धि पर है, जिसको अंग्रेजी में Motivational Speech और हिंदी में उत्प्रेरित करने वाला भाषण कहते हैं। श्रोता खर्च करके ऐसे आयोजनों में जाते हैं और वक्ता के भाषण को ध्यानपूर्वक कम सुनते हैं और ताली अधिक बजाते हैं।

विचार करने योग्य है कि जीवन में किस चीज का महत्व सबसे अधिक है। व्यावहारिक रूप से तो यही दिखाई दे रहा है कि बचपन से उस दिशा में उत्प्रेरित किया जाता है, जिससे पैसे की आमदनी हो सके। ज्ञान इसलिए अर्जित किया जाता है कि रुपया कमाया जा सके। रुपया इसलिए कि भौतिक सुख सुविधा तो देता ही देता है और जमाना पता नहीं क्यों धनवान को सम्मान भी देता है।

यथार्थ है कि धन अपने आप में बहुत बलशाली है, लेकिन उसके नियोजन के ऊपर निर्भर करता है कि जीवन सुखी रहेगा अथवा विभिन्न प्रकार के रोग-शोक का कारण बन जाएगा। जीवन में संपर्क एवं सानिध्य धनबल से अधिक शक्तिशाली तथा सामर्थ्यवान होता है। संगति क्रिया को प्रभावित करती है, और क्रिया (Action) ही अंततोगत्वा प्रतिक्रिया के स्वरूप में परिणाम उत्पन्न करती है।

रुपया, ज्ञान और संपर्क की की ताकत का परिणाम बुद्धि आधारित हो सकता है, परंतु सबसे महत्वपूर्ण क्रिया का किया जाना जब तक विवेक के ऊपर आधारित नहीं होगा तो सब कुछ रहते हुए भी जिसको वास्तविक सुख एवं संतोष की संज्ञा दी जाती है, उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

जब संसार से विदाई लेना ही लेना है तब अंतिम क्षण में मृत्यु का स्वागत तभी किया जा सकेगा जब संतोष से दिल भरा हुआ हो.. और संतोष तब प्राप्त किया जा सकता है जब धन, ज्ञान तथा क्रिया का क्रियान्वयन विवेक-युक्त दिशा की ओर किया जाता रहे।

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