हृदयानंद मिश्र
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के पलामू प्रमंडल (विशेषकर चैनपुर और मेदिनीनगर) आज एक ऐसी पहल का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज किया है, जो केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सशक्त प्रस्तावना है। झारखंड ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत जेएसएलपीएस द्वारा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से अंत:वस्त्र उत्पादन इकाई का शुभारंभ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
यह पहल कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। प्रथम, यह ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकालकर उन्हें उत्पादन और उद्यमिता की मुख्यधारा से जोड़ती है। द्वितीय, यह स्थानीय संसाधनों और श्रमशक्ति के उपयोग के माध्यम से लोकल टू ग्लोबल की अवधारणा को साकार करने की दिशा में ठोस प्रयास है।
तृतीय, यह सामाजिक संरचना में महिलाओं की भूमिका को निर्भर से निर्माता में परिवर्तित करने का सशक्त माध्यम बन रही है। स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा भारत में लंबे समय से ग्रामीण विकास का आधार रही है, लेकिन झारखंड में इसे जिस प्रकार नवाचार और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जा रहा है, वह उल्लेखनीय है।
अंत:वस्त्र उत्पादन जैसे क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी न केवल रोजगार सृजन करेगी, बल्कि बाजार में उनकी सीधी हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करेगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ेगा और आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ साकार होगा।
इस कार्यक्रम की विशेषता यह भी रही कि इसमें राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर एवं मनिका विधायक रामचंद्र सिंह की गरिमामयी उपस्थिति ने इसे राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन का स्पष्ट संकेत दिया। यह दशार्ता है कि राज्य सरकार ग्रामीण विकास को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है।
इससे पूर्व मेदिनीनगर टाउन हॉल में आयोजित मुखिया सम्मेलन भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने जिस स्पष्टता और विस्तार से पंचायती राज व्यवस्था, मुखियाओं के अधिकार और कर्तव्यों पर प्रकाश डाला, वह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।
उत्कृष्ट कार्य करने वाले मुखियाओं को सम्मानित करना न केवल प्रोत्साहन का माध्यम है, बल्कि यह एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही की संस्कृति को भी जन्म देता है। दीपिका पांडेय सिंह की कार्यशैली में एक स्पष्ट दृष्टि और संवेदनशीलता का समावेश दिखाई देता है।
वे केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान देती हैं। उनकी यह सक्रियता यह संकेत देती है कि झारखंड में ग्रामीण विकास अब केवल एक विभागीय कार्य नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले रहा है।
हालांकि, इस प्रकार की पहलों की सफलता केवल शुभारंभ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि उत्पादन इकाइयों को निरंतर प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, उत्पाद की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर भी विशेष ध्यान देना होगा, ताकि यह पहल दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बन सके।
अंतत:, पलामू की यह यात्रा यह संदेश देती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक सहभागिता का समन्वय हो, तो कोई भी क्षेत्र विकास की नयी ऊंचाइयों को छू सकता है। महिलाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रयास न केवल आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि यह एक नए सामाजिक बदलाव की नींव भी रख रहा है।
झारखंड के लिए यह एक प्रेरणादायक क्षण है और यदि इस दिशा में निरंतरता बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पलामू जैसे क्षेत्र आत्मनिर्भर भारत के सबसे सशक्त स्तंभ के रूप में उभरेंगे। (लेखक हृदयानंद मिश्र एडवोकेट सह झारखंड प्रदेश कांग्रेस के समन्वय समिति सदस्य हैं।)