- जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण
डॉ मंजूषा पूर्ति
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।
जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।
जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।
भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया।
ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।
- सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है।
- सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है।
- पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं।
- उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है।
जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन, ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।
वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें?
- जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा।
- नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए।
- सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं।
- आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।
आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।)