त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्तमान एनडीए गठबंधन की केंद्रीय सरकार का संख्याबल सरकार बनाने लायक तो है, परंतु दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण बिना विपक्षी सांसदों के समर्थन के कोई भी संशोधन विधेयक पारित नहीं करा सकती है। विपक्ष के समर्थन नहीं मिलने के कारण 131वां संशोधन विधेयक पारित नहीं किया जा सका।
मोदीजी की सरकार ने 2023 में आम चुनाव में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का बिल विपक्षी दलों के समर्थन से पारित कराया था। केंद्रीय सरकार की नियत थी कि इसे 2029 के आम चुनाव में ही लागू कर दिया जाए। इसके लिए जनगणना के आधार पर लोकसभा क्षेत्र का परिसीमन आवश्यक था, इसीलिए प्रत्येक राज्य में परिसीमन करते हुए 50% सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान था।
वैसे तो जनगणना शुरू कर दी गयी है और इसे पूर्ण होने में समय लगेगा और 2029 तक परिसीमन की क्रिया शायद नहीं हो पायेगी। राजनीति के क्षेत्र में किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए उसका अपना स्वार्थ सर्वोपरि होता है। और यही कारण है कि राजनीतिक हितों के कारण आधी आबादी के लिए 33% आरक्षण का विधेयक लोकसभा के पटल पर गिर गया।
संसद के लोकसभा में पक्ष विपक्ष के द्वारा 21 घंटे का विमर्श चला। 130 सांसदों ने बहस में भाग लिया जिनमे 56 महिला सांसदों ने अपने-अपने तर्क रखे। गृह मंत्री अमित शाहजी ने सरकार का पक्ष रखते हुए विधेयक के समर्थन में स्थिति को स्पष्ट किया। पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क हैं। संसद की कार्यवाही से देश भर में एक संदेश गया है जो राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण है।
जन-सामान्य रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहते हैं। सामान्यत: इस प्रकार के विषयों में उनकी अभिरुचि नहीं के बराबर होती है, फिर भी चुनाव में इस विषय का प्रभाव डालने का प्रयास पक्ष विपक्ष दोनों ही करेगा, जिसकी संभावना बंगाल एवं तमिलनाडु के विधानसभा के चुनाव में पड़ने की संभावना का अनुमान लगाया जा रहा है। विधानसभा चुनाव के परिणाम 4 मई को आने वाले हैं। देखना दिलचस्प होगा कि महिला वंदन अधिनियम के नहीं पास होने का प्रभाव चुनाव में कितना पड़ने वाला है।