रविवार छुट्टी की उपज जातिगत जनगणना
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्कूल के दिनों में हम यही पढ़ते और परीक्षा में निबंध लिखते रहे थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन जैसे-जैसे लेकिन दिमाग पकते गया वैसे-वैसे जानते चले गए की चले गए कि एक्चुअली हमारा देश तो जाति प्रधान देश है और शायद इसी के चलते ही शुरू हो चुकी जनगणना में जाति बताना अनिवार्य तथा परम कर्तव्य निर्धारित कर दिया गया है।
नो डाउट भारत एक बड़ा देश है, मगर यहां उससे भी बड़ी यहां जातियों की संख्या है। जन्मजात जातिगत जनसंख्या तो है ही साथ ही साथ पेशे पर आधारित जाति की भी गणना जानना कोई सरल काम नहीं है।
जाति के आधार पर जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त है उनकी सावधानी देखते ही बन रही है। कास्ट सर्टिफिकेट प्राप्त करना उत्सव बन गया है, जबकि स्वर्ण उत्साहित नहीं दिख रहे हैं क्योंकि उनका नुकसान उनके नफा में बदलने वाला नहीं है।
जातिगत भेदभाव को बढ़ावा दिया जाना राजनीति का आदर्श सिद्धांत बन गया है। राजनीतिक दलों के संगठन में वोटो का संतुलन बना रहे इसके लिए जाति के अनुपात में पद बांटे जा रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए जाति के अनुपात में टिकट बांटे जा रहे हैं। विधान परिषद एवं राज्यसभा के इनडायरेक्ट चुनाव में जातिगत संतुलन मुख्य आधार बन गया है।
संत कबीर दास ने कहा था कि
जात-पात पूछे नहीं कोई
हरि को भजे सो हरि को होई।।
लेकिन अपने कृषि प्रधान देश में;
जात-पात पूछे सब कोई
बिन जाति वैल्यू नहीं कोई।।
हमारा सौभाग्य है कि हम जन्म ही किसी जाति को लेकर पैदा होते हैं। जब तक मासूम रहते हैं इस भेदभाव से तो दूर रहते हैं लेकिन जैसे-जैसे मासूमियत दूर होती जाती है हम जाति के कैदखाना में कैद होते चले जाते हैं, जो किसी के लिए सौभाग्य बन जाता है तो किसी के लिए दुर्भाग्य।