एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। महंगाई शब्द मानव जीवन से हमेशा जुड़ा रहा है। हमारे देश में इस शब्द का अर्थ हमेशा महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि आज भी हमारे देश में मध्यम, निम्न मध्यम व गरीब वर्ग की जनसंख्या लगभग 100 करोड़ है। अब गुजरात के गरीब और झारखंड के गरीब का अंतर इतना समझ लें कि गुजरात का गरीब मासिक 20 हजार कमाता है झारखंड का पांच हजार यह उदाहरण समझने के लिये हैं। इसलिए यह वर्ग प्रभावित होने का अर्थ देश का प्रभावित होना माना जाता है। हाल में महंगाई की वजह से जनता परेशान हैं और इस बार लगातार बढ़ते दामों और गिरती आय का डबल डोज एक साथ लग रहा है। कोरोना के संकट से हमारे सिस्टम या सिस्टम संचालनकर्ताओं यानि नेताओं को शायद ही कोई फर्क पड़ा हो या न पड़ा हो लेकिन जनता की कमर टूट चुकी है। जैसा कि कोरोना के पहले कालखंड के बाद ही छोटी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह आधी या उससे भी कम कर दी थी जो अब तक भी पूरी नहीं हुई, चूंकि उसके बाद जैसे ही बाजार उठ रहा था, वैसे ही दूसरी लहर ने सब बर्बाद कर दिया था और अब हम तीसरी लहर में प्रवेश कर चुके हैं और स्थिति वैसी ही है। और यदि अब व्यापारी वर्ग की बात करें तो व्यापार की हालात भी पहले से बहुत नाजुक बनी हुई हैं। बाजार में काम इतने कम हो चुके हैं कि कंपनी के खर्च भी निकल नहीं पा रहे और कई व्यापारी ने अपने धंधे तक बंद कर दिए। वे अब बेरोजगारों की श्रेणी में आ चुके हैं। देश का गणित जो आज आप भी अंदाज लगा सकते हैं ऐसे समझिये। सवा करोड़ ड्राइवर परिवार समेत छह करोड़ पच्चीस लाख लोग सरकारी ड्राइवर छोड़ सब परेशान, एक करोड़ सिक्यूरिटी मैन पांच करोड़ परिवार के लोग, दस करोड़ किसान सरकार आकड़ा पचास करोड़ परेशान क्या मैंने सौ करोड़ भारतीय को परेशान बताया तो गलत कहां है? यह गणित मेरे जैसा सामान्य बुद्धि का व्यक्ति समझ सकता है तब देश के मंत्री, प्रशासनिक अमला फैला और नीति निर्धारकों ने क्या आख पर पट्टी बांध रखा है। हां, रखा है कैसे समझते हैं। इसके अलावा एक फील्ड ब्वॉय ने बताया मुझे तनख्वाह के अलावा कंपनी से दो रुपये लीटर प्रति किलोमीटर के हिसाब से पेट्रोल खर्च मिलता है, लेकिन जब से लेकर अब तक पेट्रोल का भाव तीस रुपये लीटर बढ़ चुका लेकिन कंपनी अधिक पैसे बढ़ाने को तैयार नही हैं और जो कंपनी के काम से बाहर जाता हूं उस वजह से मेरी तनख्वाह से पेट्रोल लग जाता है। अब बच्ची का एक किलो दूध जिसमें 16 सौ रुपये लगते थे उसे आधा किलो किया है। यह सौ करोड़ की पीड़ा है। ईंधन के दाम बढ़ने से सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ती है यदि इसे सरल भाषा में एक उदाहरण के रूप में समझें तो हिमाचल से दिल्ली किसी सब्जी के ट्रक का किराया पच्चीस हजार हैं और डीजल के दाम बढ़ने से वह किराया तीस हजार रुपये हो जाता है तो जो सब्जी 50 रुपये किलो थी वह सीधा 60 रुपये किलो हो गई। एक चीज से ही बहुत सारी चीजें प्रभावित होती हैं। ईंधन का दो बढ़ने से खाने पीने की आपूर्ति का खर्च बढ़ता है जिससे अन्तत: महंगाई बढ़ती है। भारत हाल ही में बेंट क्रूड का भाव कम है जिसकी वजह से पेट्रोल-डीजल के मौजूदा रेटों में लगभग 8 से 10 रुपये तक का भाव कम हो सकता है लेकिन इस ओर सरकार न जाने किस वजह से ध्यान नही दे पा रही। बता दें कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने में अहम भूमिका इंटरनेशनल मार्केट में बेंट कू्रड के भाव के आधार पर तय होती है। यदि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम कम हो जाते हैं तो पेट्रोल-डीजल के दाम पर भी गिर जाते हैं। हालांकि बेंट क्रूड की कीमतों कम होने का बाद उस देश की मर्जी पर भी तय होता है कि वह दाम कम करें या न करें। हमारे देश में केंद्र के बाद राज्य सरकारें भी अपना टैक्स लगाते हुए रेट में बदलाव कर सकती हैं। इस ही वजह से हमारे देश में हर राज्य में पेट्रोल व डीजल का रेट अलग-अलग होता है। सरकार को त्वरित प्रभाव से पेट्रोल व डीजल के दामों में कटौती करनी चाहिए। जिन देशों में पेट्रोल सबसे महंगा है, उन देशों की सूची में हमारा देश 58वें नंबर पर आता है हालांकि कभी-कभी एक-दो पायदान ऊपर नीचे होता रहता है। बीते वर्ष मई तक भारत में पेट्रोल की कीमत 1.31 डॉलर प्रति लीटर पहुंच गई थी जिससे कई शहरों में सौ रुपये प्रति लीटर तक रेट पहुंच गया था। यदि हम अपने पडोसी देशों पाकिस्तान,नेपाल और भूटान में पेट्रोल हमारे यहां से सस्ता बिकता है। भारत सरकार इस पर गौर करे। बीते दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टेक्सटाइल पर जीएसटी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की घोषणा की थी लेकिन बाद में कई राज्यों और इंडस्ट्री के आग्रह करने के बाद फैसला वापस लेना पड़ा। चूंकि क्लोदिंग आवश्यक वस्तु में शामिल है और इस पर होजरी मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ने जीएसटी बढ़ाने के फैसले पर चिंता जताई थी। होजरी मैन्युफैक्चरर अनुसार कपड़ों पर जीएसटी बढ़ने आम आदमी प्रभावित होता और एमएसएमई सेक्टर को भी इससे नुकसान होता चूंकि देश के कपड़ा उत्पादन में असंगठित क्षेत्र का 80 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान है। इससे बुनकर सबसे ज्यादा प्रभावित होत सकते थे। पहले से ही कोरोना की वजह से बीते दो वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार अधिकतर छिनैत व चोर अच्छे परिवार और शिक्षित थे। एक राजा था उसकी प्रजा अकाल से पीड़ित थी और कर भी कसाई की तरह लेता। खूब मारता राजा क्रूर और राक्षस था। प्रजा त्रस्त थी। यह कहानी आज पुरानी है क्या? ज्यादा महंगाई के चलते बेरोजगारी बढ़ने पर कहीं गृह युद्ध जैसा माहौल न हो जाए। सरकार को आर्थिक विशेषज्ञों के पैनल के साथ इस बार गरीब व मध्यम वर्ग की सुध लेते हुए बजट बनाना होगा। मोदी सरकार को भ्रम है कि राष्ट्रवाद का मुददा काम करेगा लेकिन महंगाई की चोट उन्हें कई बार लग चुकी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)