त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। झामुमो के 16 उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। पार्टी ने 21 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, लेकिन 5 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया।
असम के चाय बागानों में काम करने वाले अधिकांश लोग झारखंड के आदिवासी निवासी हैं, जिन्हें वहां टी ट्राईबल के नाम से जाना जाता है जबकि झामुमो उन्हें ट्राईबल नाम करने का मांग करता रहा है जिसे हेमंता की सरकार ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी है।
2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनाव प्रभारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता सरमा को सह प्रभारी बनाया था। हिमंता ने ही पूरी चुनाव की रणनीति झारखंड में रहकर बनायी थी। वह दो महीने तक झारखंड में जमे रहे।
जबरदस्त कैंपेन किया। भाजपा के पक्ष में अनेक प्रकार की कूटनीतिक चाल चली। झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता और हेमंत सोरेन के करीबी पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को भाजपा में शामिल कराकर एक बड़ा झटका दिया। दूसरे दलों के कई नेताओं को भाजपा में शामिल कराया। शतरंज की हर चाल चली।
हालांकि अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन हेमंत सोरेन के आंख की वह किरकिरी जरूर बन गये, और यही कारण है कि हेमंत सोरेन असम में चुनाव लड़वा रहे हैं, जबकि बंगाल में उनकी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है। बंगाल में आदिवासियों की संख्या अच्छी खासी है और उसकी सीमा झारखंड से लगता है।
हेमंत सोरेन ने असम में भी कांग्रेस से गठबंधन का प्रयास किया लेकिन बिहार के तरह कांग्रेस ने घास नहीं डाला। असम में चुनाव लड़ने से कांग्रेस के साथ झामुमो के रिश्ते में दरार पड़ी है। इसका असर भी दिखने लगा है। झामुमो प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कांग्रेस को विषैला सांप तक कह दिया है।
इधर, झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने पहली बार झारखंड के सरकार के विरुद्ध जमकर भड़ास निकला है। खनन माफिया, सरकार के कामकाज और जिलों के डीसी की भूमिका पर सवाल उठाये हैं। समझा जा सकता है कि बात अब सीमा से आगे बढ़ गयी है। इस प्रकरण का असर इंडिया गठबंधन के ऊपर तो निश्चित ही पड़ेगा और राजनीति के जानकारी के द्वारा इसकी भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि झारखंड में सरकार का परिदृश्य परिवर्तित हो सकता है।