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एजेंडा बनाम प्रोपेगेंडा...

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एजेंडा बनाम प्रोपेगेंडा...
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कार्य-सूची बनाम प्रचार-प्रसार 

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर आदमी का अपना एजेंडा होता है और वह अपने एजेंडा का प्रोपेगेंडा भी   अपने ताकत भर करता है। एजेंडा का प्रकार तथा स्टैंडर्ड हर किसी का अपने औकात के हिसाब से ही होता है। किसी का छोटा एजेंडा बड़ा प्रचार तो किसी का खाली प्रचार कोई एजेंडा नहीं और किसी का बड़ा प्रोपेगेंडा छोटा एजेंडा। 

एजेंडा और प्रोपेगेंडा के बीच गहरी रिश्तेदारी है और चोली-दामन वाला दोस्ती है। हमारे मोहल्ले में एक नेताजी रहते हैं। उनके पास कोई एजेंडा नहीं होता है, लेकिन वे कुर्ता पजामा बंडी धारण करने वाले प्रोपेगेंडा के कुशल कलाकार हैं। हमारा ही एक मित्र निठल्ला नाम से मशहूर है, लेकिन उसकी प्रोपेगेंडा देखने लायक होती है।

 हमारे गुरुजी अपने मोटिवेशनल स्पीच में बड़े आत्मविश्वास के साथ समझाने का प्रयास करते हैं कि इस संसार में प्रोपेगेंडा से बड़ा कोई दूसरा नशा नहीं है जो एक बार चढ़ता है तो कभी उतरता ही नहीं है, बाकी सब किस्म का नशा चढ़ने के बाद निर्धारित समय के बाद उतर जाता है और इसीलिए उसे बार-बार चढ़ाने के लिए चिलम गरम करना पड़ता है।  वह नशा ही क्या जिसे छुपाया जा सके। स्कूल के दिनों में रटा हुआ छंद का अर्थ अब जाकर बुढौती में समझ में आ रहा है कि 

खैर खून खांसी खुशी, वैर प्रीत मधुपान! 

रहिमन दाबे ना दबे, जानत सकल जहान!!

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