त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिवकुमार तिवारी वाराणसी गदोलिया के रहने वाले मेरे रिश्तेदार के घर मैं अतिथि स्वरूप रात्रि में रुका हुआ था। उसी दिन संध्या वहां से सांसद नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय अपने चुनाव क्षेत्र में प्रवास के बाद वापस दिल्ली लौटे थे।
मेरे रिश्तेदार तिवारी जी बताने लगे कि मोदी जी लगातार तीन दिनों से बनारस में रैली कर रहे थे। प्रतिदिन लगातार 14 घंटे का व्यस्ततम कार्यक्रम (भाषण, दर्शन, बयान, कार्यकर्ताओं से मिलना और अभिवादन स्वीकार करना, प्रशासनिक पदाधिकारियों से विमर्श) प्रात: उनकी व्यक्तिगत दिनचर्या के पश्चात पुन: वही परिश्रम वही व्यस्तता।
तिवारी जी की जिज्ञासा थी कि मोदी जी किस मिट्टी के बने हुए हैं; न थकते हैं न रुकते हैं और न ही धैर्य खोते हैं। रोज 18 घंटे काम करना, पैसे के लिए नहीं, खानदान के लिए नहीं; मात्र अपने देश के लिए उनका हर एक पल समर्पित होता है।
तिवारी जी कल्पना कर रहे थे कि अभी रात में मोदी जी अपने निवास स्थान दिल्ली पहुंचेंगे। थका मांदा, पूरे दिन भर के अनुभव, क्रिया प्रतिक्रिया का मन में बोझ, दुनिया भर की चिंता लिए निर्जीव मशीन की तरह काम करते भावहीन कर्मचारियों के बीच एकदम अकेला... लोग बताते हैं कि मोदी जी केवल चार घंटे की ही नींद लेते हैं।
कोई सुधि लेने वाला आसपास नहीं। राजनीति का क्रूर, कठोर और भावहीन मार्ग, चाटूकार और स्वार्थी लोगों का जमावड़ा, विरोधियों की गाली, बद्दुआ, हाय, श्राप सब कुछ सहते झेलते मां भारती के सेवा में अनवरत व्रतधारी।
तिवारी जी ने मुझसे पूछा है कि मोदी जी का जीवन तो बहुत रूखा-सूखा होगा? अब मेरे बोलने की बारी थी। मैंने कहा कि जिस व्यक्ति के साथ 144 करोड़ देशवासियों की सहानुभूति हो, समर्थन हो, आशीर्वाद हो और जिसके जीवन का आधार आध्यात्मिक हो; उसका जीवन रूखा-सूखा कैसे हो सकता है? कर्त्तव्य पथ का राही असंतुष्ट कैसे रह सकता है?
मोदी जी का अपना व्यक्तिगत जीवन अनेक रंगों से भरा हुआ है। संतुष्टि एवं आनंद में मग्न रहते हैं। यह अलग बात है कि राजनीतिक विषयों एवं राष्ट्रीय हित के विषय पर नीतिगत अत्यंत कठोर निर्णय लेते हुए उसका अनुपालन भी करते/कराते हैं। अंत में हम और तिवारी जी इस बात से सहमत हो गये कि विभूतियों का मूल्यांकन एवं आकलन हम दोनों के सामर्थ्य से बाहर की विषय-वस्तु है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)