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युवाओं को सुगमतापूर्ण शिक्षा देने से ही संभव है प्रगति...

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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (वरुण गांधी)। आज युवा दिवस है। देश स्वामी विवेकानंद जी को याद कर रहा है। लेकिन देश की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आकांक्षा वास्तव में कभी फलीभूत नहीं हुई। ऐसे में ऊंचे लक्ष्य तय करना जरूरी है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2014 में प्रति छात्र सालाना 12,500 रुपये खर्च किए, जो कि जीडीपी का करीब तीन-चार फीसदी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपना खर्च बढ़ाकर जीडीपी के करीब छह फीसद तक लाएं। 1960 के दशक से यह वांक्षित लक्ष्य रहा है, लेकिन अब जाकर सरकार ने इसे वास्तविक लक्ष्य बनाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में कुल पंजीकरण का अनुपात 50 फीसदी बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इधर, शिक्षा के क्षेत्र में दूसरी समस्याएं भी हैं। संगीता कश्यप मध्य प्रदेश की 46 वर्षीय स्कूल शिक्षिका हैं, जो इंदौर और आसपास के इलाके के मशहूर सरकारी अहिल्या आश्रम स्कूल में पढ़ाती हैं। पीटीआई की अगस्त, 2014 की खबर के अनुसार, अपने 24 साल लंबे करियर में पिछले 23 वर्षों से वह ड्यूटी से अनुपस्थित हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली की ऐसी दुसाध्य बीमारियों को भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दुरुस्त करना चाहती है। ग्रामीण भारत में आमतौर पर शिक्षक किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं होते हैं,  उनके पास अक्सर सिर्फ स्नातक की डिग्री होती है, और कुछ के पास थोड़ा-बहुत शिक्षण-प्रशिक्षण का अनुभव भी। हमें शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधा में प्रशिक्षित करने की जरूरत है, जिससे उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा परिणाम देने के काबिल बनाया जा सके, जबकि मौजूदा शिक्षकों को अपने कौशल को उन्नत बनाने का मौका दिया जाना चाहिए। उनके काम की निगरानी के लिए एक मूल्यांकन प्रणाली बनानी होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं- इसमें प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में बदलाव पर ध्यान दिए जाने के साथ ढेरों संस्थागत सुधार शामिल हैं। नई शिक्षा नीति में अध्यापन के लिए जरूरी न्यूनतम डिग्री बी.एड. है। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अब विद्यालय पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए चार हिस्सों में बांट दिया गया  है। जो शिक्षक जिन विषयों में पढ़ाना चाहते हैं, उन्हें टीईटी या एनटीए में उन विशिष्ट विषयों में अंकों के आधार पर काम पर रखा जाएगा। इसके साथ ही टीईटी पास करने वालों का साक्षात्कार में स्थानीय भाषा का ज्ञान भी परखा जाएगा। शिक्षकों से अब हर साल करीब 50 घंटे के नियमित प्रोफेशनल डेवलपमेंट कोर्स में शामिल होने की अपेक्षा होगी। इसके अलावा एनसीटीई द्वारा शिक्षकों के लिए गाइडलाइंस के रूप में राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक बनाए जाएंगे। और अंत में कार्यकाल, पदोन्नति तथा वेतन संरचना के लिए एक योग्यता-आधारित ढांचा विकसित किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विज्ञान व कला और शैक्षणिक व व्यावसायिक प्रशिक्षण के बीच कठोर बंटवारे को खत्म कर दिया है। विद्यार्थी अब दोनों तरह के पाठ्यक्रमों में से चुनाव कर सकते हैं- यह हमारे नागरिकों को हर तरह की जरूरत के लिए तैयार करने में मददगार होगा। कला संकाय (मानविकी) को लेकर हमारी लंबी उपेक्षा आखिरकार सुधर जाएगी। नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं पर भी ध्यान दिया गया है। हमारे देश के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को तीन भाषाओं (राज्य और क्षेत्र के हिसाब से) के विकल्प का अधिकार दिया जाएगा, जबकि संस्कृत विश्वविद्यालयों को बहु-विषयक संस्थानों में बदल दिया जाएगा। (लेखक भाजपा के सांसद हैं।)
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