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विकसित भारत की आत्मा : संत रविदास के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता

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विकसित भारत की आत्मा : संत रविदास के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता
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संत रविदास जयंती पर विशेष 

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दहलीज पर खड़ा है। आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति, डिजिटल क्रांति और वैश्विक पहचान ये सभी उपलब्धियां गर्व का विषय हैं। किंतु इसी विकास यात्रा के साथ सामाजिक विषमता, जातिगत मानसिकता, धार्मिक असहिष्णुता, नैतिक पतन, बेरोजगारी, उपभोक्तावाद और मूल्यहीनता जैसी समकालीन चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में जब युवा वर्ग भ्रम, आक्रोश और अस्मिता के संकट से जूझ रहा है, संत रविदास के विचार दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करते हैं। 

रविदास जयंती केवल एक संत की स्मृति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समानता और श्रम-सम्मान के दर्शन को पुन: समझने का अवसर है। संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) के निकट सीर गोवर्धनपुर में माना जाता है। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो सामाजिक दृष्टि से उस समय तथाकथित निम्न वर्ग में रखा जाता था। उनके पिता संतोख दास और माता कर्मा देवी (या कालसा देवी) श्रमजीवी थे। पिता जूते-चप्पल बनाने का कार्य करते थे। यह वही पेशा था जिसे समाज ने हेय दृष्टि से देखा, पर रविदास ने इसी श्रम को साधना में बदल दिया। 

यहीं से उनका पहला संदेश निकलता है काम छोटा नहीं होता, सोच छोटी होती है। संत रविदास की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, पर उनकी आध्यात्मिक और बौद्धिक चेतना अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने जीवन की पाठशाला से शिक्षा ली। वे भक्ति आंदोलन की निर्गुण धारा के प्रमुख संत थे। कबीर, नामदेव, दादू, सेन, त्रिलोचन ये सभी संत एक ही सामाजिक चेतना की कड़ी थे, जो कर्मकांड, जाति-भेद और पाखंड के विरुद्ध खड़े हुए। 

रविदास के गुरु को लेकर मतभेद हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि उन्होंने स्वानुभूति को ही अपना गुरु माना। संत रविदास का दर्शन केवल भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज-सुधार का क्रांतिकारी घोषणापत्र था। उनके प्रमुख विचार थे जाति आधारित भेदभाव का विरोध, श्रम की प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा, समता और करुणा, ईश्वर की सर्वव्यापकता। 

उनका प्रसिद्ध पद है मन चंगा तो कठौती में गंगा आज के उपभोक्तावादी और तनावग्रस्त समाज के लिए यह पंक्ति मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक शांति का सूत्र है। संत रविदास की सबसे मौलिक अवधारणा है बेगमपुरा। बेगमपुरा शहर को नाउं, दुख-अंदोह नाहीं तिहि ठाउं। बेगमपुरा का अर्थ है ऐसा नगर जहां किसी प्रकार का भय, दुख, भेदभाव या शोषण न हो। 

संत रविदास कहते हैं कि यह एक ऐसा शहर है जहां कोई मानसिक या सामाजिक पीड़ा नहीं है कोई कर (खिराज) या जबरन वसूली नहीं, कोई अपराध का भय नहीं, कोई जाति, ऊंच-नीच या अपमान नहीं, उस समाज में सभी लोग समान हैं, कोई पराया नहीं, हर व्यक्ति जहाँ चाहे, सम्मान के साथ रह सकता है। यह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की परिकल्पना है। 

यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि समाजवादी और समतामूलक राष्ट्र की पूर्व-परिकल्पना है। आज जब हम विकसित भारत @2047 की बात करते हैं, तो बेगमपुरा उसका नैतिक खाका बन सकता है। राष्ट्र के प्रति संत रविदास का दायित्वबोध यह बताता है कि संत रविदास ने कभी सत्ता नहीं चाही, पर उन्होंने समाज को जागृत किया और जागृत समाज ही राष्ट्र की शक्ति होता है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि राष्ट्र केवल भूमि नहीं, मानव मूल्यों का समुच्चय है। 

भक्ति का अर्थ पलायन नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है, धर्म का अर्थ विभाजन नहीं, मानवता का विस्तार है, मीरा, जो एक राजघराने से थीं, उन्होंने भी रविदास को गुरु माना। यह तथ्य सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक उदाहरण है। संत रविदास का जीवन आसान नहीं था। जातिगत अपमान, आर्थिक तंगी, सामाजिक बहिष्कार, धार्मिक कट्टरता लेकिन उन्होंने कभी प्रतिशोध नहीं चुना। उन्होंने विरोध को करुणा से और अपमान को आत्मबल से परास्त किया। 

आज के युवाओं के लिए यह सबसे बड़ा सबक है- संघर्ष से भागना नहीं, उसे मूल्यबोध में बदलना। आज की प्रमुख समस्याएं—जातिगत राजनीति, सोशल मीडिया पर घृणा, बेरोजगार युवाओं में कुंठा, धर्म के नाम पर विभाजन, नैतिक पतन इन सबका समाधान संत रविदास के विचारों में निहित है, जाति नहीं, कर्म से पहचान, धर्म नहीं, मानवता से मूल्यांकन, भोग नहीं, संतुलन से सुख। आज का युवा प्रश्न पूछता है—मैं कौन हूं? मेरा मूल्य क्या है? 

संत रविदास उत्तर देते हैं—तुम्हारा मूल्य तुम्हारे जन्म से नहीं, तुम्हारे विचार और कर्म से तय होता है। यदि युवा श्रम को सम्मान दे, विविधता को स्वीकार करे, आत्मसम्मान को अहंकार न बनाए, तकनीक के साथ नैतिकता जोड़े तो वही युवा विकसित भारत का निमार्ता बनेगा। तात्पर्य रविदास केवल अतीत नहीं, भविष्य हैं। संत रविदास इतिहास के पन्नों में बंद कोई संत नहीं, बल्कि भारत की चेतना में प्रवाहित विचारधारा हैं। 

विकसित भारत का अर्थ केवल ऊंची इमारतें, तेज इंटरनेट, बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। विकसित भारत का अर्थ है समान अवसर, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक समरसता और मानवीय गरिमा और इन सबकी आत्मा संत रविदास के विचारों में बसती है। रविदास जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों की केवल माला नहीं, मार्ग बनायें और अपने जीवन में आत्मसात करें। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देशक और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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