विचार
आज कितना सुरक्षित है समाज, भय के माहौल में कैसे होगा विकास
ABN Bureau
•
09 Jan, 2022
•
13 मिनट में पढ़ें
2 Views
विज्ञापन
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (बाबूलाल मरांडी)। किसी समाज या राज्य की समृद्धि का पैमाना केवल आर्थिक उन्नति या सुविधा संपन्न होने को ही नहीं माना जा सकता। बल्कि समाज के लिए भयमुक्त और सुरक्षायुक्त वातावरण एक आदर्श परिकल्पना है। असुरक्षा की भावना लोगों के आत्मविश्वास को कम करता है, जो समाज और राज्य के उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है। 21 वर्ष पूर्व विश्व मानचित्र में आया एक नया राज्य झारखंड आज अपनी तरूणाई अवस्था को पार कर अपनी परिपक्वता की ओर अग्रसर है। अब इस परिपक्व अवस्था वाले राज्य से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वभाविक है। आर्थिक शब्दावली और आंकड़ों के जाल को अगर दूर भी रखा जाए तो मोटे शब्दों में यहां के लोग कितने खुश है, कितने सुरक्षित और कितने समृद्ध हैं, इन सवालों पर तो पूर्वाग्रह की भावना त्याग कर वैचारिक विमर्श आवश्यक है।निश्चित रूप से कोरोना महामारी के बाद सरकार के सामने चुनौतियां है, इस महामारी ने काफी नुकसान पहुंचाया है। केन्द्र सरकार की टीकाकरण और सामाजिक सुरक्षा के तहत राशन और आर्थिक मदद कहीं न कहीं लोगों के मन में आत्मविश्वास बढ़ाने वाला ही है। अब हमें यह स्वीकार करना होगा कि आनेवाला कुछ वर्ष कोरोना के साथ ही बीतेगा। अब इन चुनौतियों के बीच ही अन्य सारे काम करने होंगे। इस महामारी के बाद अपने राज्य झारखंड की बात करें तो लोगों को सिवाय निराशा और असुरक्षा के कुछ नहीं मिला। कोरोना महामारी सरकार को अपनी अकर्मण्यता और नाकामियों को छिपाने के लिए एक दिव्य अस्त्र मिल गया। विगत 2 वर्षों में जिस प्रकार हत्या, लूट और बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई, वो आज किसी से छिपी हुई नहीं है। विगत दो सालों में 3451 हत्याएं, 3154 बलात्कार और 654 नक्सली घटनाएं ये बताने के लिए काफी है कि आज राज्य की कानून व्यवस्था सबसे कमजोर अवस्था में है। अपराधी बेलगाम हो चुके हैं, प्रशासन राज्य सरकार के टूल के रूप में काम कर रही है। कई मामलों में अपराधियों को पकड़ने के बजाय पुलिस निर्दोषों को ही पकड़कर जेल भेजने की खबरें सामने आती रही है। अपराधों के इन आंकड़ों पर गौर करना इसलिए भी आवश्यक है कि अगर स्थितियां ऐसी ही बनी रहे तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना के विकास की कल्पना ही नहीं कर सकते। साहिबगंज की होनहार महिला दारोगा रूपा तिर्की हत्या का मामला हो, धनबाद के जज की हत्या या हालिया सिमडेगा में मॉब लिंचिंग का मामला। सारे प्रकरणों में राज्य सरकार की भूमिका और जांच के प्रति उदासीनता कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है। वर्ष 2022 के शुरूआती दिनों में जिस प्रकार से मनोहरपुर के पूर्व विधायक गुरूचरण नायक के ऊपर नक्सली घटना हुई और उनके दो अंगरक्षकों को निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया वो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन उससे कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण इस घटना के बाद राज्य सरकार की नक्सलियों पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टे पूर्व विधायक को दोषी ठहराना कहीं न कहीं नक्सलियों को ही संरक्षण देने के समान है। नक्सलियों की हिम्मत आज इतनी बढ़ी हुई है कि वो पुलिस के हथियार छिनकर ले जा रहे हैं और पूरा का पूरा प्रशासनिक तंत्र इसके सामने लाचार सा नज़र आता है। जब मैं गुरूचरण नायक जी से मिलकर वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए चक्रधरपुर से सोनुवा के रास्ते आगे बढ़ा तो पुलिस ने यह कहकर रोक दिया कि आगे जाना सुरक्षित नहीं है। अब कल्पना कीजिए कि स्थिति कितनी खराब है कि दिन के उजाले में मुख्य सड़क तक भी जाने में पुलिस डर रही है। मुझे रोकने के पीछे कारण राजनैतिक भी हो सकता है, लेकिन ये स्वीकारोक्ति अपने आप में प्रशासन का असहाय होने का बोध कराता है। ठीक उसी दिन सिमडेगा जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर कोलेबिरा थानार्न्तगत बसराजारा गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, संजू प्रधान नामक एक दलित युवक को 500 की उन्मादी भीड़ ने पीट पीटकर अधमरा कर दिया और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। इस मॉब लिंचिंग के पहले गांव में ही लोगों ने बैठक की और हत्या की पूरी योजना बना ली थी। प्रत्यक्षदर्शियों और मृतक के परिजनों की माने तो पुलिस भी भीड़ के साथ आई थी और वो घटना को रोकने के बजाय मूकदर्शक बनी रही। लोग संजू को पीटते रहे, उसकी पत्नी और मां सबके सामने गिड़गिड़ाती रही, पुलिसवालों के पैर पकड़कर संजू को बचाने की गुहार लगाती रही, लेकिन पुलिसवालों ने कुछ नही किया उल्टे पूरे घटनाक्रम की वीडियो बनाती रही। शुक्रवार की रात गुमला के गुरदरी थानांतर्गत एनकेसीपीएल के बॉक्साइट माइंस के प्लांट में नक्सली धावा बोलकर 27 वाहनों को जला डाला और कर्मियों के साथ पिटाई भी की। हर बार की तरह पुलिस देर से आई और जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाएगी। अब सवाल उठता है कि आज राज्य में पुलिस इतनी लाचार क्यों है? क्यों अपराधियों और नक्सलियों के सामने नतमस्तक होकर उसके ही संरक्षक की भूमिका में क्यों है? पुलिसवाले अगर चाहते तो संजू की जान बच सकती थी, लेकिन उसके बाद पुलिस के द्वारा सादे कागजों में मृतक की पत्नी से हस्ताक्षर कराकर उनके ही परिजनों को मामले में फंसाकर जेल भेज देना कई सवाल पैदा करता है। ऐसी कौन सी ताकतें है, जो मुख्य आरोपियों को बचा रही है जबकि उसके परिजन खुलकर आरोपियों के बारे में बता रहे हैं। बात केवल संजू, गुरूचरण या रूपा तिर्की तक ही सीमित नहीं है। इन दो वर्षों में जिस प्रकार से अपराधियों की हिम्मत में बढ़ोत्तरी हुई है, जेल से अपराधियों के रंगदारी का तंत्र, अवैध उत्खनन माफिया का साम्राज्य, बलात्कारियों की हिम्मत और नक्सलियों की बढ़ती ताकत को रोकने में सरकार विफल ही रही है। जबतक राज्य इन सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना का विकास कैसे कर सकते हैं? (लेखक झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता विधायक दल, भारतीय जनता पार्टी
झारखण्ड प्रदेश हैं।)
विज्ञापन