एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संध्या चौधरी उर्वशी)। हम हनुमान के विचार के बिना श्री राम के बारे में नहीं सोच सकते या अर्जुन को याद किये बिना श्रीकृष्ण का स्मरण नहीं कर सकते। इसी प्रकार ईसा तथा संतपाल की तरह बुध तथा आनंद की बात है। यही संबंध श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद के बीच है। क्योंकि यदि एक जलस्रोत था तो दूसरा इस जल स्रोत का प्रवाह रूप झरना था। श्री राम कृष्ण के लिए ईश्वर एक तथ्य तथा एक वास्तविकता थी। उन्हें ईश्वर के बारे में वाद-विवाद करने की आवश्यकता नहीं थी। वे विश्वास पूर्वक ईश्वर की पुष्टि कर सकते थे। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के शिखर थे। उनका दृष्टिकोण वैश्विक उनकी अनुभूति सर्वस्पर्शी, सर्व समावेशक थी। उनके विचार आज भी भारतीय जनमानस पर विद्यमान हैं। एक अच्छा वक्ता होने के कारण लोगों के दिलों को बखूबी जीत लेते थे।आज भी इनके विचार अतुल्य और धरोहर के रूप में भारतीय युवाओं में विद्यमान हैं। सचमुच वे एक विद्वान पुरुष के रूप में ही नहीं, बल्कि एक अच्छे शिष्य के रूप में भी अपनी छवि भारतीय जनमानस में युवाओं में बहुत लोकप्रिय हैं। स्वामी विवेकानंद श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रधान छात्र, उनके अत्यंत प्रिय शिष्य, उनके महानतम उत्तराधिकारी, उनके यथार्थ भाष्यकार तथा अत्यंत दक्ष कार्यवाहक भी थे।
सन 1893 की मई में स्वामी जी शिकागो में सितंबर में होने वाली विश्व धर्म महासभा में भाग लेने के लिए भापचलित जलयान से रवाना हुए। उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया। उनका नाम प्रतिनिधियों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। कुछ कठिनाई के पश्चात उन्हें धर्म महासभा में सम्मिलित होने का अवसर मिल गया। सम्मिलित न होने देने की किसी भी कठिनाई की तुलना में वे कहीं अधिक प्रदीप्त प्रतिभा संपन्न थे। परंतु तब यह प्रथम वक्तव्य में ही दिग्विजय की बात थी, जब गरिमापूर्ण सभा को संबोधित करने की उनकी बारी आई। तब वे उषाकाल के सूर्य की भांति उठे तथा अमेरिका की बहनों और भाइयों यह शब्द कहे। उस हार्दिक पुकार ने विश्व धर्म महासभा तथा पश्चिमी जगत को मंत्र मुग्ध कर दिया। वे संकीर्णता में जकड़े धर्म पंथों तथा बौने मत वादों से ऊपर उठकर समन्वय तथा सार्वभौमिकता के बारे में बोले। उनका संदेश मानो दम घुटे लोगों के लिए जीवन स्वास था।व्याख्यान करते हुए पश्चिमी देशों के निवासियों को शिक्षित करते तथा उन्हें भारतीय दर्शन के अध्ययन में सहायता करते हुए कई मास तक अमेरिका में रहे। तत्पश्चात वे इंग्लैंड तथा यूरोप गए। दो संस्कृति के बीच आपसी समझ के लिए सेतु बने। सन 18 सो 97 में स्वामी स्वामी जी भारत लौटे। समूचा राष्ट्र एकीकृत होकर उनके स्वागत के लिए उठा।भारतीय जनता ने उन्हें आदि शंकराचार्य के नूतन अवतार के रूप में पाया, जो मातृभूमि को ओजपूर्ण तथा जीवन शक्ति से स्फूर्ति करने को उठ खड़ा हुआ था। स्वामी जी ने अपने देशवासियों को भारतीय राष्ट्रीय आदर्श त्याग के महान आदर्श का स्मरण कराया। उन्होंने भारतीयों के हृदयों में यह बात प्रविष्ट करा दी कि भारत में जन्म प्राप्ति परम सौभाग्य की बात है तथा उन्हें बताया कि किस प्रकार आध्यात्मिक संस्कृति ही भारत के अनश्वर अस्तित्व का रहस्य है। उन्होंने भारत को प्रबुद्ध भारत बना दिया। परंतु वे सलाह देने या उपदेश देने तक ही सीमित नहीं रहे। एक कुशल संगठनकर्ता थे।उन्होंने अपने गुरुदेव के लक्ष्य को निरंतरता को सुनिश्चित बनाए रखने के लिए एक संगठन की स्थापना करनी चाही। इसलिए उन्होंने रामकृष्ण मठ तथा मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलूर मठ है। इस संस्था का उद्देश्य है "आत्मनो मोक्षार्थ जगद्विताय च" अर्थात अपनी मुक्ति एवं संसार का कल्याण भी। स्वामी विवेकानंद अभी 40 वर्ष के भी नहीं हुए थे कि वे महासमाधि में लीन हो गए। परंतु उनकी आयु की गणना सौर वर्षों के आधार पर नहीं होनी चाहिए ।लगभग एक दशक के लोकाप्रित कार्य से ही उन्होंने मानस चेतना में ऐसे विचार आरोपित कर दिए, जिनके संपूर्ण क्रियान्वयन के लिए डेढ़ हजार वर्ष लग सकते हैं। उनके जीवन कार्य का एक तो भारतीय पक्ष है तथा दूसरा अंतर्राष्ट्रीय पक्ष है। इन दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेजोड़ है। (लेखिका संध्या चौधरी उर्वशी, कचहरी झारखंड रांची की निवासी हैं। वह एमए मनोविज्ञान तथा कत्थक नृत्यांगना शिक्षिका हैं। उनकी गायन में भी रूचि है। इसके अलावा वह समाजसेविका,
अनेक सम्मान से सम्मानित, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन साझा संकलन इत्यादि से विभूषित हैं।)