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विचार

... तो ठगे नहीं जाओगे

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... तो ठगे नहीं जाओगे
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त्रिवेणी दास

एक समय था 

जब कहा जाता था

आलोचना में छुपा सत्य

प्रशंसा में छुपा झूठ

यदि समझ गए तो

सही मार्ग पाओगे 

ठगे नहीं जाओगे

 

जमाना बदल गया है 
झूठ और सच का 
दिवाला निकल गया है 
आलोचना में भी झूठ है 
प्रशंसा सूखा ठूंठ है
न प्रशंसा में खुशी 
न आलोचना में दुखी 
अपना राह खुद बनाओ
बुद्धि का कमाल दिखाओ

समय के साथ चलना 

वर्तमान का मूल्य समझना

यही यथार्थ नीति है 

जैसा देखो वैसा करो 

चाणक्य का नीति

अपने कर्म में धरो...

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