नितिन नंदन
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सब कुछ स्थायी नहीं होता। विचारधाराएं भी अक्सर परिस्थिति के अनुसार बदल जाती हैं, रिश्ते भी बदल जाते हैं और सहयोगी भी। जनता कभी-कभी सोचती है कि दलों के बीच दीवारें बहुत ऊंची होंगी, लेकिन अचानक किसी घटना से वही दीवारें गिर जाती हैं और जिनके बीच खाई दिखाई देती थी, वे हाथ मिलाते नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति तो इस संदर्भ में और भी दिलचस्प है, क्योंकि यह राज्य भारतीय लोकतंत्र का प्रयोगशाला रहा है, जहां जाति, वर्ग, अपराध, धर्म और नेतृत्व सभी एक साथ राजनीति के ताने-बाने को बुनते हैं।
ऐसी ही एक ताजा घटना हाल ही में देखने को मिली जब समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर मुलाकात की। यह एक साधारण औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि एक ऐसा प्रसंग था जिसने राजनीति की जमीन को हिला दिया और सत्ता तथा विपक्ष दोनों में हलचल मचा दी। पूजा पाल का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। वे लंबे समय से प्रयागराज की राजनीति से जुड़ी रही हैं और उनका राजनीतिक सफर कई तरह की त्रासदियों और संघर्षों से होकर गुजरा है।
राजनीति में उनका प्रवेश व्यक्तिगत जीवन की पीड़ा के साथ हुआ। पति रंजन पाल की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। इस चुनाव के पीछे न तो कोई महत्त्वाकांक्षा थी और न ही सत्ता की कोई स्वप्निल तस्वीर, बल्कि यह पीड़ा थी जिसने उन्हें राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। समाजवादी पार्टी ने उन्हें अवसर दिया और उन्होंने पार्टी के सहारे अपने क्षेत्र में पैठ बनाई। वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनीं और विधानसभा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन राजनीति का मैदान बहुत कठोर होता है।
यहाँ केवल जनाधार ही काफी नहीं होता, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, नेतृत्व की नीतियों से सामंजस्य और पार्टी लाइन पर चलना भी अनिवार्य होता है। इसी कसौटी पर पूजा पाल फंस गयीं। विधानसभा सत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस नीति की प्रशंसा की जिसके अंतर्गत अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि योगी सरकार के कारण ही अतीक अहमद जैसे अपराधियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सका। यह वक्तव्य विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज तो हुआ ही, मीडिया के जरिए व्यापक चर्चा में भी आ गया।
यही वह क्षण था जब समाजवादी पार्टी की नेतृत्व टीम असहज हो गयी। एक विधायक, जो विपक्षी पार्टी से चुनी गयी हो, अगर सत्ता पक्ष की नीति की सार्वजनिक सराहना करे तो यह पार्टी की केंद्रीय रणनीति के खिलाफ माना जाता है। अखिलेश यादव ने इसे अनुशासनहीनता के रूप में देखा और तत्काल प्रभाव से पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस निर्णय ने सबको चौंका दिया। जनता को यह महसूस हुआ कि सपा अब उस लोकतांत्रिक परंपरा को जगह नहीं देना चाहती जहाँ विधायक अपनी अंतरात्मा की आवाज भी बुलंद कर सके।
यहाँ पर एक गहरी विडंबना छुपी है। समाजवादी पार्टी का इतिहास बताता है कि यह पार्टी हमेशा हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज रही है। मुलायम सिंह यादव के समय में यह पार्टी पिछड़े वर्गों, किसानों और अल्पसंख्यकों की आकांक्षाओं को आवाज देने के लिए पहचानी जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे संगठन सत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित होता गया, आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता गया। पार्टी में अब वैचारिक बहस की जगह कम होती जा रही है।
पूजा पाल के निष्कासन ने इस विडंबना को उजागर कर दिया कि पार्टी अब अपने विधायकों की स्वतंत्र राय को जगह देने में सक्षम नहीं रही। दूसरी तरफ भाजपा की राजनीति को देखिये। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया है जिसमें अपराध और माफियागिरी के खिलाफ कठोर कार्रवाई को जनता के बीच सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जनता की स्मृति में दशकों तक अपराध-राजनीति का गठजोड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश में माफिया डॉन और अपराधी लंबे समय तक चुनाव जीतते रहे, सत्ता के गलियारों में पैठ बनाते रहे और प्रशासन को चुनौती देते रहे। अतीक अहमद जैसे नाम तो मानो इस स्याह दौर के प्रतीक बन गए। योगी आदित्यनाथ ने जब इस पूरी परंपरा को तोड़ने का अभियान शुरू किया और माफिया राज को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये, तो जनता को लगा कि सरकार पहली बार गंभीरता से अपराधमुक्त शासन का सपना साकार कर रही है।
पूजा पाल ने जब मुख्यमंत्री की इसी नीति की सराहना की, तो वस्तुत: उन्होंने जनता की भावना को ही अभिव्यक्त किया। लेकिन उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी पार्टी को नागवार गुजरी। भाजपा ने इस अवसर को तुरंत पहचाना। निष्कासन के अगले ही दिन पूजा पाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँचीं। यह मुलाकात महज संयोग नहीं थी, बल्कि राजनीति की दूरगामी रणनीति का हिस्सा थी। इस भेंट से भाजपा को यह कहने का अवसर मिला कि उनकी नीतियाँ इतनी स्पष्ट और प्रभावी हैं कि विपक्ष के नेता भी उन्हें नकार नहीं सकते।
भाजपा इस घटना को अपने पक्ष में भुनाने में देर नहीं करेगी। आने वाले चुनावों में भाजपा यह तर्क रख सकती है कि जब विपक्ष के विधायक भी सरकार की अपराध-विरोधी नीतियों को सही मान रहे हैं, तो जनता को अब संदेह करने की आवश्यकता ही नहीं है। इससे भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव को और बल मिलेगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी इस घटना से कमजोर होती दिख रही है। पार्टी का संदेश यह जा रहा है कि वह असहमति बर्दाश्त नहीं कर सकती।
जनता के बीच यह छवि बन सकती है कि सपा अब लोकतांत्रिक संवाद की बजाय केवल नेतृत्व की हाँ में हाँ मिलाने वाली पार्टी बन गई है। इस पूरी घटना में महिला नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की राजनीति लंबे समय तक पुरुष नेताओं और दबंग छवियों पर केंद्रित रही। महिलाओं की भागीदारी सीमित रही और जब रही भी तो अक्सर उन्हें किसी राजनीतिक वंश या पुरुष नेता की छाया में देखा गया। पूजा पाल ने इस धारणा को चुनौती दी।
उन्होंने विधानसभा में स्वतंत्र रूप से अपनी राय रखी और मुख्यमंत्री की नीति का खुलेआम समर्थन किया। इस साहसिक कदम ने उन्हें अन्य महिला नेताओं से अलग पहचान दी। भाजपा के लिए यह भी एक अवसर है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने एजेंडे में प्रमुखता देती रही है। अगर पूजा पाल भाजपा के साथ जुड़ती हैं, तो यह भाजपा को महिला मतदाताओं के बीच एक नया संदेश देने का मौका देगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध और सत्ता का गठजोड़ इतना गहरा रहा है कि वह राजनीति की छवि को हमेशा कलंकित करता रहा है। जनता बार-बार यही चाहती रही है कि अपराधियों का राजनीति से सफाया हो। योगी आदित्यनाथ ने इस दिशा में कदम उठाकर एक नई परंपरा शुरू की है। पूजा पाल ने जब इस परंपरा की प्रशंसा की, तो यह जनता की भावना का प्रतिनिधित्व था। लेकिन विडंबना यह रही कि उनकी पार्टी ने इस परंपरा की बजाय अनुशासन के चश्मे से देखा और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
भविष्य की राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह घटना निर्णायक साबित हो सकती है। भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने में सफल होगी।
भाजपा का यह कहना आसान होगा कि हमारे शासन की ताकत इतनी है कि विपक्षी भी इसकी सराहना करने से खुद को रोक नहीं पाते। दूसरी ओर, सपा के लिए यह संकट का संकेत है। पार्टी पहले ही लगातार चुनावी पराजयों से जूझ रही है। यदि उसके विधायक और नेता धीरे-धीरे पार्टी से अलग होने लगते हैं, तो जनता में यह संदेश जाएगा कि पार्टी अब विकल्प के रूप में मजबूत नहीं रही। पाल का भविष्य चाहे जिस दिशा में जाए वे भाजपा में शामिल हों या स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनें इतना निश्चित है कि उनका यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर चुका है।
अब वे केवल एक विधायक नहीं रहीं, बल्कि वे उस बहस का केंद्र बन चुकी हैं जिसमें यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या राजनीतिक दल अपने नेताओं को स्वतंत्र राय रखने देंगे या नहीं, क्या राजनीति अब भी विचारों और नीतियों की प्रतिस्पर्धा का मंच है या केवल नेतृत्व के आदेशों का पालन करने की मशीन? पूजा पाल का निष्कासन और योगी से मुलाकात लोकतंत्र की उस गहरी सच्चाई को उजागर करता है कि राजनीति में असहमति को दबाने के बजाय उसका स्वागत करना चाहिए। क्योंकि असहमति ही लोकतंत्र की आत्मा है।
यदि असहमति को जगह नहीं मिलेगी तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।समाजवादी पार्टी ने इस असहमति को दबाकर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है, जबकि भाजपा ने इस असहमति को अवसर बनाकर अपनी राजनीति को और मजबूत कर लिया है। जनता सब देख रही है। जनता यह भी देख रही है कि एक महिला विधायक ने अपने साहस से पार्टी लाइन को तोड़ा और जनता की भावना को व्यक्त किया। जनता यह भी देख रही है कि सत्ता पक्ष ने इस अवसर को अपने पक्ष में कैसे बदल लिया। और जनता यह भी देख रही है कि विपक्षी पार्टी ने अपने ही विधायक को निकालकर अपनी कमजोरी उजागर कर दी।
आने वाले चुनावों में जनता इन सब बातों का हिसाब करेगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह घटना आने वाले वर्षों तक याद रखी जाएगी। क्योंकि यह केवल एक विधायक का निष्कासन और मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र, असहमति, अपराध-राजनीति और महिला नेतृत्व इन सबका संगम था। राजनीति में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं जो एक नया विमर्श खड़ा करती हैं। पूजा पाल का यह प्रसंग भी वैसा ही है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर राजनीति किस दिशा में जा रही है और लोकतंत्र में असली ताकत किसके पास है नेताओं के पास, जनता के पास, या पार्टी के अनुशासन के पास?