त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसार में पैदा लेने के बाद सांसारिक वातावरण का प्रभाव विशुद्ध 100% स्वाभाविक है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना सामान्य बात है। सांसारिक आकर्षण, वातावरण में व्याप्त अनावश्यक शोरगुल और अनंत इच्छाएं आज तनाव, उलझन, अवसाद इत्यादि से ग्रसित कर रहा है।
जिनका दुष्प्रभाव प्रभाव हमारे देह के ऊपर भी होते हुए उसे रोगी बना रहा है। समुचित निर्देशन और समाधान के लिए हम यहां-वहां भटकते रहते हैं जबकि हमारा निर्देशक स्वयं हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है। हम उसकी आवाज को अनसुनी कर देते हैं अथवा उसकी उपस्थिति को अस्वीकार करते रहते हैं।
ध्यान पूर्वक एकाग्रचित होकर अपने अंतःकरण में गोता लगाया जा सकता है। सतत अभ्यास से यह धीरे-धीरे सरल हो जाता है। उसके निर्देशन से हमारी अनिश्चितता तथा अनिर्णय की दुविधा समाप्त हो जाती है। हमारा व्यक्तित्व और कार्य सांसारिक जगत में अद्भुत परिणाम उत्पन्न करता है और परिष्कृत अंतस के संतुष्टि और तृप्ति के औषधि से काया और मन शक्ति-संपन्न सदैव स्वस्थ रहता है।