84वीं पुण्यतिथि पर विशेष
- गुरुदेव की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है शहर
- अंग्रेज अगर जमीन मुहैया कराते तब हजारीबाग में ही बनता शांति निकेतन!
प्रो. प्रमोद कुमार
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है हजारीबाग। उनकी कविता की यह पंक्ति जोदी तोर डाक शुने केऊना, आसे तोबे एकला चलो रे... आज भी हर साहित्य प्रेमियों की जुबान पर अनायास ही प्रस्फुटित होते रहती है। इसकी रचना एकीकृत हजारीबाग जिले के गिरिडीह में विश्व कवि ने की थी।
हजारीबाग में गुरुदेव का आगमन होना पूरी इलाके के लिए गौरव का विषय है। एक ऐसा विराट व्यक्तित्व का स्वामी जिसने पूरी एशिया में अपनी प्रतिभा का परचम लहराते हुए नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। गुरुदेव ने विश्व के मानचित्र पर अपने देश का नाम सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करने का काम किया।
हजारीबाग शहर इस मामले में काफी सौभाग्यशाली रहा है यहां गुरुदेव के चरण पड़े, प्रवास हुआ, सृजन की धारा प्रवाहित हुई तथा इतिहास के अध्याय में कई अविस्मरणीय पन्ने जुट गए। विश्वकवि पर पिछले 55 वर्षों से लगातार शोध कर रहे 86 वर्षीय श्री अमल सेन गुप्ता की चर्चा करना यहां लाजमी होगा।
श्री सेनगुप्ता न तो विश्वविद्यालय,न किसी कॉलेज और न किसी स्कूल के मास्टर रहे। वे डाक विभाग में पोस्ट मास्टर थे, इसके बावजूद गुरुदेव की रचनाओं के मास्टरपीस के रूप में उनकी चर्चा बांग्ला साहित्य जगत में की जाती रही है।
श्री सेन गुप्ता से लिए गए साक्षात्कार के अनुसार रविंद्रनाथ टैगोर 1885 ई की अप्रैल माह में पहली बार हजारीबाग पधारे थे। उनके साथ भतीजी इंदिरा देवी तथा भतीजा सुरेंद्रनाथ टैगोर थे। इंदिरा जी के स्वास्थ्य लाभ के क्रम में यहां प्रवास हुआ था।
इंदिरा जी कोलकाता के लोरेटिव कॉन्वेंट की छात्रा थी। उन्होंने अपनी स्मृति गाथा में हजारीबाग के डाक बंगला में ठहरने का वर्णन किया है। प्रवास की क्रम में उनका यदुगोपाल मुखर्जी के घर आना जाना होता था। श्री मुखर्जी स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता थे।
प्रोफेसर प्रशांत कुमार पाल ने अपनी पुस्तक रवि जीवनी के खंड 2 के पृष्ठ संख्या 235 में रवि बाबू से जुड़ी यात्रा का उल्लेख किया है। इस पुस्तक में अमल सेनगुप्ता के बारे में उल्लेख करते हुए कहा गया है कि तमाम जानकारी उनके पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत की गई है। उसे समय गुरुदेव अपने परिजनों के साथ हजारीबाग रोड में ट्रेन से उतरने के बाद पुश- पुश गाड़ी से हजारीबाग पहुंचे थे।
गुरुदेव का हजारीबाग में दूसरी बार 1903 में आगमन हुआ था। लकड़ा गोदाम के जूलु पार्क में बने डाक बंगला में प्रवास हुआ था। लकड़ा गोदाम 29 बीघा जमीन में बसा हुआ था जिसके मालिक गुरुदेव के रिश्तेदार काली कृष्ण ठाकुर थे। लोक निर्माण विभाग के इस निरीक्षण बंगला में रोशनी और हवा की सही व्यवस्था नहीं थी,परिणाम यह हुआ कि गुरुदेव समेत उनके सभी परिजन बीमार पड़ गए।
इस संबंध में अमल दा अपनी प्रकाशित पुस्तकों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं कि शहर के नामी बंगाली सज्जन गिरेंद्र कुमार गुप्ता आग्रह पूर्वक गुरुदेव को अपनी बाड़ी में ले गए। गुरुदेव की देखभाल करने वालों में ऋषिकेश दास गुप्ता,हेमनलिनी देवी और शीर्ष मजूमदार की साली थी। गिरेंद्र बाबू का बाड़ी अभी भी मेन रोड में पैगोड़ा होटल के पीछे अवस्थित है।
“नौका डूबी’’ गुरुदेव की महत्वपूर्ण कृति है जिसकी रचना गिरेंद्र बाबू की बाड़ी में हुई थी और इसकी नायिका शीर्ष मजूमदार की साली हेमनलनी देवी थी।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अंग्रेज सरकार हजारीबाग में गुरुदेव को जमीन उपलब्ध अगर कराती तो शांति निकेतन की स्थापना यही होती। गुरुदेव ने अपने मित्र शिर्ष मजूमदार को पत्र लिखकर इच्छा जतायी थी कि जमीन अगर मिलती तो शांतिनिकेतन के विद्यार्थियों के लिए तपोवन एवं हेल्थ रिजॉर्ट बनाया जाता। शिर्षदा 1903 में रेलवे एक्विजिशन ऑफीसर के पद पर यहां कार्यरत थे।
गुरुदेव के हजारीबाग में आए 140 वर्ष पूरे हो गए हैं। उनकी स्मृतियों को सहेजने एवं संरक्षित करने का काम बखूबी अमल दा ने किया है।
भोरे पाखी डाके कोथाए…….. की रचना हजारीबाग की प्राकृतिक खूबसूरती को देखकर हुई थी। इस शहर में एक ऐसे विराट व्यक्तित्व का प्रवास हुआ, जिसमें गुरुदेव का नाम सर्वोपरि है। भावी पीढ़ी को इसकी जानकारी होनी चाहिए, कि एक ऐसा कलम का संवेदनशील व्यक्ति हजारीबाग में सृजन का महाजाल फैलाकर शब्दों को कैद किया था जिसकी 28 वर्षों बाद नोबेल पुरस्कार अपने देश की झोली में आई।
प्रो प्रमोद कुमार
सहायक प्राध्यापक ( अवकाश प्राप्त)
राजनीति विज्ञान विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग