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आधुनिकता की आंधी में कुंद पड़ती सोहराय कला

आधुनिकता की आंधी में कुंद पड़ती सोहराय कला
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हंसराज चौरसिया

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक विविधता केवल उसके मंदिरों, ग्रंथों और त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके गांवों की मिट्टी में, उसकी लोककथाओं में और उन अनकही कलाओं में बसी हुई है जिन्हें पीढ़ियों तक लोग जीते आए हैं। इन्हीं अनमोल परंपराओं में से एक है सोहराय चित्रकला एक ऐसी दीवार-चित्रण की परंपरा जो झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा जैसे राज्यों के आदिवासी समुदायों की आत्मा में बसती है। 

सोहराय चित्रकला केवल एक दृश्य कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति की जीवंत भाषा है। यह पर्व विशेष रूप से फसल कटाई के समय मनाया जाता है, जब जनजातीय समाज प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए अपने घरों और गोठों को सजाता है। महिलाएं दीवारों को लीप-पोतकर उस पर चित्र बनाती हैं पशु-पक्षी, वृक्ष, बेल-बूटे, देवी-देवता, और जीवन के अनेक प्रतीकों को। यह परंपरा न केवल दृश्य रूप में सुंदर होती है, बल्कि इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना काम करती है। 

इस चित्रकला की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वाभाविक और आत्मप्रेरित होती है। कलाकार यानी गांव की महिलाएं, किसी औपचारिक प्रशिक्षण या डिज़ाइन पाठ्यक्रम से नहीं गुजरतीं। वे इसे अपनी माताओं और दादियों से सीखती हैं, जो स्वयं इसे पीढ़ियों से करती आ रही होती हैं। यह कला श्रुत परंपरा और अभ्यास पर आधारित होती है एक ऐसी परंपरा जिसमें चित्रों के माध्यम से जीवन के विविध अनुभवों को, भावनाओं को और लोकविश्वासों को अभिव्यक्त किया जाता है। 

सोहराय की दीवारें केवल सजावट नहीं हैं। वे एक सामाजिक दस्तावेज़ हैं, जिनमें उस समाज की स्त्रियों का आत्मबोध, उनकी संवेदनाएं, और उनकी प्रकृति के साथ सामंजस्य का चित्रण छिपा होता है। यह चित्रकला केवल उत्सव की प्रतीक नहीं है, यह उस जीवनदर्शन की अभिव्यक्ति है जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई विभाजन नहीं है, जहां गाय, बैल, वृक्ष, नदी और स्त्री सब एक ही जीवनचक्र का हिस्सा हैं। लेकिन आज इस चित्रकला का स्वर धीमा होता जा रहा है। वह जो कभी हर गांव की हर दीवार पर दिखाई देती थी, वह अब खोजने पर भी मुश्किल से मिलती है। 

इसका एक बड़ा कारण है आधुनिकता की आंधी, जिसने गांवों की संरचना, जीवनशैली और मूल्यों को तेजी से बदला है। पहले जहां मिट्टी की दीवारें आम थीं, आज वहां सीमेंट और पक्के मकान आ गए हैं। इन पक्की दीवारों पर न तो लीपने की परंपरा रह गई है और न ही उस पर चित्रकारी की जरूरत महसूस की जाती है। दूसरी ओर, बाजारवाद और मीडिया ने ग्रामीण समाज को शहरी दिखने की होड़ में डाल दिया है। अब गांवों में भी लोग घरों को शहरों की तरह सजाना चाहते हैं आधुनिक रंग, वॉलपेपर, टाइल्स और प्लास्टिक की सजावटों से। 

ऐसी स्थिति में मिट्टी और गोबर से बनी पारंपरिक चित्रकला पुरानी और गंवारू समझी जाने लगी है। युवा पीढ़ी, जो मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ चुकी है, उसे अब इन परंपराओं में न तो गर्व की अनुभूति होती है और न ही उनमें कोई भविष्य दिखता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और सरकारी नीतियां भी इस दिशा में पूरी तरह निष्क्रिय हैं। आज स्कूलों में बच्चों को अंतरिक्ष विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेजी सिखाई जाती है, लेकिन उनके अपने समाज की कला, इतिहास और परंपराओं से उन्हें काट दिया जाता है। 

नतीजा यह होता है कि वे अपनी जड़ों से अपरिचित होते जाते हैं और अपने ही समाज की धरोहरों को उपेक्षित कर देते हैं। कुछ स्थानों पर जरूर कुछ संस्थाएं, कलाकार और शोधकर्ता इस चित्रकला को बचाने के प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ये प्रयास सीमित और प्रायः शहर केंद्रित हैं। जब तक यह कला उस समाज में, उसी की भाषा में, उसी की जमीन पर नहीं बचेगी, तब तक यह केवल एक लोककला बनकर रह जाएगी, जीवित परंपरा नहीं। सोहराय चित्रकला को केवल फोक आर्ट के नाम पर दीर्घाओं में टांग देने से यह नहीं बचेगी। 

इसे गांवों में, स्कूली पाठ्यक्रमों में, लोकमंचों पर, महिलाओं के स्व-सहायता समूहों में, और जन-चेतना अभियानों में जीवित करना होगा। इसके लिए सरकार, समाज और शिक्षा प्रणाली को मिलकर एक समेकित प्रयास करना होगा। इस चित्रकला का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आदिवासी स्त्रियों की रचनात्मकता और आत्माभिव्यक्ति का माध्यम है। एक ऐसे समाज में जहां स्त्रियों की आवाज़ें अक्सर दबा दी जाती हैं, सोहराय चित्रकला उन्हें एक ऐसा मंच देती है जहां वे बिना बोले भी बहुत कुछ कह पाती हैं।

चित्रों में उनकी सोच, उनकी भावनाएं, उनका पर्यावरण से रिश्ता, उनकी धार्मिकता और उनकी सामाजिक भूमिका सब कुछ समाहित होता है। ऐसे में इस चित्रकला को बचाना, केवल एक सांस्कृतिक विरासत को नहीं, बल्कि स्त्री स्वाभिमान और सृजनात्मकता को भी बचाना है। सोहराय चित्रकला के साथ-साथ इससे जुड़ी अनेक उपकथाएं, गीत, लोकगीत और मान्यताएं भी हैं जो धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। अगर यह परंपरा समाप्त हो गई, तो केवल एक दृश्य कला ही नहीं जाएगी, बल्कि उससे जुड़े लोकज्ञान, लोकविश्वास और सामाजिक संरचनाएं भी खो जाएंगी।

आज हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि हम किस प्रकार की आधुनिकता को अपनाना चाहते हैं। क्या वह आधुनिकता जो हमारी जड़ों को काटकर केवल उपभोक्तावाद को बढ़ावा देती है? या वह जो अपनी परंपराओं को समझते हुए, उन्हें साथ लेकर भविष्य की ओर बढ़ती है? सोहराय की दीवारें अब चुप हैं। लेकिन यह चुप्पी केवल एक कला की नहीं है, यह एक चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते अपनी परंपराओं की ओर मुड़कर नहीं देखा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास इतिहास की केवल तस्वीरें होंगी, अनुभव नहीं। हमें यह याद रखना चाहिए कि परंपरा कोई बोझ नहीं होती, बल्कि वह एक ऐसी विरासत होती है जो हमारी अस्मिता, हमारी पहचान और हमारे सामाजिक ताने-बाने की नींव होती है। 

सोहराय चित्रकला हमें सिखाती है कि प्रकृति, स्त्री, समाज और कला ये सब आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग करना, या किसी एक को खो देना, पूरे ताने-बाने को कमज़ोर करना है। इसलिए यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस चित्रकला को फिर से गांव की दीवारों पर जीवित करें। इसे स्कूली शिक्षा में लाएं, इसे डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत करें, इसे महज अतीत की वस्तु न बनाएं। कलाकारों को सम्मान दें, उन्हें मंच दें, और सबसे महत्वपूर्ण  समाज को यह समझाएं कि मिट्टी की दीवार पर बना चित्र किसी ब्रांडेड दीवार घड़ी से अधिक जीवंत और मूल्यवान हो सकता है। यदि हम अब भी चुप रहे, तो एक दिन इतिहास हमें यह कहेगा कि हमने केवल एक चित्रकला को नहीं, एक समाज की स्मृति, स्त्री की रचनाशीलता और प्रकृति से हमारे रिश्ते को खो दिया। सोहराय की दीवारें हमसे पुकार रही हैं क्या हम उनकी आवाज़ सुनने को तैयार हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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