त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जब हमें कोई सहयोग करता है अथवा हमारी इच्छा के अनुसार कार्य के लिए उद्धत होता है तो उसके अनेक कारण हो सकते हैं, परंतु की गयी प्रतिक्रिया के प्रति आभार व्यक्त करने से अनेक सूक्ष्म तथा प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होते हैं।
भौतिक दृष्टि से सूक्ष्म लाभ के रूप में सर्वप्रथम तो हमारे अंदर के अहंकार का दमन होता है और हमारे परिष्कृत व्यवहार के कारण सहयोगी का अतिरिक्त आस्था, विश्वास एवं सत्यनिष्ठा का प्रतिफल प्राप्त होता है और हमारे इक्षित कार्य की गति कई गुणा बढ़ जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर के आराधना में हम उन्हें आह्वान करते हैं, उन्हें सक्रिय रहने की प्रार्थना करते हैं और समर्पण भी करते हैं; यह सब करते हुए यदि उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट नहीं कर पाये तो स्वयं के श्रेष्ठ होने का अभिमान हमारे सर के ऊपर चढ़कर बोलने लगता है।
हमारी विनम्रता खो जाती है तथा हमारी आराधना निष्फल हो जाती है। जैसे-जैसे हमारे अंदर कृतज्ञता की भावना प्रबल होते जाती है वैसे-वैसे हम अपने निर्धारित लक्ष्य के निकट होते चले जाते हैं। कृतज्ञता प्रकट करने के लिए शब्दों से कहीं अधिक व्यवहार प्रभावशाली होता है...।