अब अंदरूनी लड़ाई में फंसा पाकिस्तान
डॉ प्रभात ओझा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत-पाकिस्तान के बीच 10 मई की शाम 5 बजे से शुरू सीजफायर दुनिया में तनाव कम होने की तरह देखा जायेगा। इसके विपरीत खुद पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। इसे उसी रात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के देश के नाम संबोधन से समझा जा सकता है। शहबाज ने अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों को सहयोग अथवा सीजफायर में मदद के लिए शुक्रिया कहा।
गौर करने लायक है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने जनरल मुनीर के लिए भी ऐसा ही शुक्रिया करने के साथ एक कटु बात भी जोड़ दी। वह कठोर तथ्य यह है कि शहबाज ने परोक्ष रूप से मान लिया कि भारत के हमलों से पाकिस्तान को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा है। सही मायनों में अब इस नुकसान की जिम्मेदारी तय करने का समय शुरू हो गया है।
पीएम शहबाज के कई देशों और अपने सहयोगियों के लगातार धन्यवाद करते जाने के बीच दुनियाभर के कूटनीतिक विशेषज्ञ सांस रोके भाषण खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें थोड़ी देर के लिए शायद यह लगा कि शहबाज अपनी कुर्सी छोड़ने जा रहे हैं। लगा कि सीजफायर होते ही शहबाज को विदा करने की योजना बन चुकी है। ऐसा नहीं हुआ। उसके बाद अब शहबाज शरीफ की चाल की चर्चा शुरू हो गयी है।
पाकिस्तानी हुक्मरान ही नहीं, आम लोगों को भी पता है कि भारत-पाक के मध्य हर युद्ध अथवा संघर्ष में पाकिस्तान की बदहाली के लिए किसी के सिर ठीकरा फोड़ने की परंपरा रही है। आमतौर पर इसमें राजनेताओं के बजाय सैन्य अधिकारी हावी होते रहे हैं। फिलहाल स्थिति अलग लग रही है। शहबाज ने संघर्ष में भारत की मजबूती और पाकिस्तान की बबार्दी का जिक्र कर फिलहाल इसकी जिम्मेदारी सेना पर डालने की कोशिश की है। ऐसे में सेना और सरकार के बीच अघोषित संघर्ष शुरू हो चुका है।
इस तरह का ताजा मामला वर्ष 1999 के कारगिल युद्द का है, तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कहते हैं कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को विश्वास में लिए बिना कारगिल, द्रास और बटालिक की चोटियों पर कार्रवाई शुरू कर दी थी। जब इन जगहों पर पाकिस्तानी सेना हार गयी तो जनरल मुशर्रफ ने पीएम नवाज को आगे कर दिया। बाद में तख्तापलट की कहानी लंबी हो जायेगी।
पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री को इसका अंदाजा है। तभी उन्होंने जिम्मेदारी के लिए जनरल मुनीर को आगे करने की कोशिश की है। ऐसा करना उन्हें इसलिए भी जरूरी लगा कि सीजफायर तो पड़ाव भर है। अभी भारत की ओर से सिंधु का पानी रोकना,दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते फिर से कायम करने के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ते बहाल करने जैसे बड़े काम बाकी हैं।
स्वाभाविक रूप से इसके लिए पाकिस्तानी राजनेताओं को ही आगे आना होगा। भारत का लोकतांत्रिक नेतृत्व भी सैन्य शासक की जगह पाकिस्तानी राजनेताओं को ही प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान स्वयं इस हार के दंश से किस तरह बाहर निकलेगा, यह समझने के लिए कुछ समय लगेगा। फिलहाल, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुनीर पर आम पाकिस्तानियों का गुस्सा फूटने लगा है।
पाकिस्तान के बुद्धिजीवी खुलेआम पाकिस्तान आर्मी चीफ के अप्रैल में दिए बयान को याद कर रहे हैं। जनरल मुनीर ने अपने उस बयान में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग बताया था। पाकिस्तानी प्रोफेसर डॉ इश्तियाक अहमद ने कहा है कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बाजवा के कार्यकाल में पाकिस्तान में शांति रही।
आसिम मुनीर ने इस बात की चिंता नहीं कि मुसलमानों की एक तिहाई आबादी भारत में ही रहती है। मुनीर ने इस भावना को भड़काया कि हिंदुओं और मुसलमानों में कुछ भी एक जैसा नहीं है। बहरहाल, प्रो इश्तियाक का बयान एक उदाहरण भर है। यह आगाज है,अंजाम क्या होगा, इसे जानने के लिए इंतजार तो करना ही पड़ेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)