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यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव का देश पर असर...

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यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव का देश पर असर...
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से वैसे तो प्रदेशों में सरकारों का गठन होना है लेकिन यह नतीजे केंद्र की राजनीति की दशा-दिशा भी तय करेंगे। साल 2014 से केंद्र में भाजपा का राज उत्तर प्रदेश के बलबूते ही बना हुआ है इसलिए भाजपा हर हाल में यह प्रदेश दोबारा जीतना चाहेगी। यही नहीं उत्तर प्रदेश में यदि योगी आदित्यनाथ दोबारा सत्ता में वापसी करते हैं तो भविष्य में केंद्रीय राजनीति के द्वार भी उनके लिए खुल जायेंगे। इन चुनावों में वर्तमान मुख्यमंत्रियों का राजनीतिक भविष्य तो दांव पर लगा ही है साथ ही विपक्ष के कई नेताओं के लिए अपना आधार बचाये रखने के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण हैं। इन चुनावों में गठबंधन राजनीति के उन नये प्रयोगों की भी परख होगी जो भाजपा को हराने के लिए बनाये गये हैं। इन चुनावों के परिणाम इस सवाल का भी कुछ हद तक जवाब तलाशेंगे कि साल 2024 में होने वाले आम चुनावों में किन नेताओं के बीच होगा मुकाबला ? ममता बनर्जी ने अन्य राज्यों में तृणमूल कांग्रेस का आधार बढ़ाने के लिए और विपक्ष का नेतृत्व हासिल करने के लिए जो अभियान चलाया है यदि उसमें उन्हें सफलता मिली तो आगे के लिए उनका हौसला बुलंद हो जायेगा और विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ से खिसक जायेगा। सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजनीति की ही बात कर लें तो यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष सत्ता में वापसी की तगड़ी और मुश्किल चुनौती है। यदि वह सत्ता में वापसी करते हैं तो इतिहास रच देंगे और भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में शुमार हो जायेंगे। हो सकता है आगे चल कर उनको पीएम उम्मीदवार भी बना दिया जाये लेकिन यदि उनके नेतृत्व में पार्टी सत्ता में नहीं लौटी तो वह राजनीतिक रूप से एकदम किनारे किये जा सकते हैं। वहीं अखिलेश यादव के लिए भी खुद को साबित करने का अहम मौका है। अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह यादव की इच्छा के विपरीत समाजवादी पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और एक के बाद एक ऐसे फैसले किये जिससे पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इस बार यदि उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया तो यकीनन उनका राजनीतिक कद बढ़ जायेगा और यदि वह एक बार फिर विफल रहे तो घर से ही उनके खिलाफ बगावत खड़ी हो सकती है। यही नहीं अखिलेश के नेतृत्व वाला गठबंधन अगर हारा तो आगामी चुनावों में राजनीतिक दल उनके साथ गठबंधन के लिए राजी नहीं होंगे। इसी तरह कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक कॅरियर के लिए भी यह चुनाव बड़ी चुनौती हैं क्योंकि लोकसभा चुनावों में गांधी परिवार का गढ़ अमेठी भी बचाने में नाकामयाब रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा यदि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को नहीं उबार पाईं तो आगे के लिए मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष रहे चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद अब पार्टी की कमान उनके बेटे जयंत चौधरी के हाथ में आ गयी है। जयंत के समक्ष अपने राजनीतिक कॅरियर को और पार्टी को बचाये रखने की तगड़ी चुनौती है। देखना होगा कि क्या समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर जयंत अपनी पार्टी का खाता विधानसभा में खोल पाते हैं। अन्य राज्यों की पार्टियां जैसे पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस, दिल्ली से आम आदमी पार्टी, तेलंगाना से एआईएमआईएम जैसे दल भी उत्तर प्रदेश में अपने लिये संभावनाएं तलाशने पहुँचे हैं। इन पार्टियों के नेता अपने आप को यूपी के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं और बड़े-बड़े वादे भी कर रहे हैं। देखना होगा कि प्रदेश की जनता इनके बारे में क्या फैसला करती है। वहीं बात अगर उत्तराखण्ड की करें तो जबसे इस राज्य का गठन हुआ है तबसे एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस सत्ता में आती रही है। यहां अधिकतर मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये लेकिन राजनीतिक रूप से कभी बड़ी अस्थिरता का सामना इस राज्य ने नहीं किया। इस समय भाजपा सरकार का नेतृत्व पुष्कर सिंह धामी के हाथ में है। धामी जिस स्टाइल में काम कर रहे हैं उसने राज्य सरकार के प्रति नकारात्मक भाव को कुछ हद तक कम जरूर किया है लेकिन देखना होगा कि क्या वह उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास बदल पाने में सक्षम हो पाएंगे जिसमें किसी पार्टी की सरकार लगातार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है। उत्तराखंड में भाजपा के समक्ष नेतृत्व का संकट तो नहीं है लेकिन कांग्रेस जरूर इस मुद्दे को लेकर परेशान है। वहीं गोवा राज्य की बात करें तो जिस तरह की राजनीतिक उठापटक यहां देखने को मिल रही है वह चुनाव करीब आते-आते और बढ़ेगी। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर की पसंद थे। यकीनन वह साफ छवि के मुख्यमंत्री साबित हुए हैं लेकिन पार्टी को सत्ता में लाने की चुनौती पर विजय यदि वह पा लेते हैं तो उनका कद बढ़ जायेगा। दूसरी ओर कांग्रेस में जिस तरह की भगदड़ मची है वह ऐन चुनावों से पहले पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। राहुल गांधी ने कुछ क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ गठबंधन तो करा दिया है लेकिन वहां कांग्रेस ही नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के समक्ष पंजाब में सिर्फ अपनी सत्ता बचाने की चुनौती नहीं है बल्कि गांधी परिवार के फैसले को भी सही साबित करने की चुनौती है। गांधी परिवार के निर्देश पर ही कैप्टन अमरिंदर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बनाये गये। यदि कांग्रेस पंजाब हारी तो गांधी परिवार के फैसलों पर जी-23 के नेता बड़े सवाल फिर से खड़े कर सकते हैं। दूसरी ओर पंजाब में सरकार और कांग्रेस का बरसों तक नेतृत्व करने के बाद अब कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी पार्टी बना चुहके हैं और वह भाजपा के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरने वाले हैं। देखना होगा कि इस गठबंधन को राष्ट्रवाद का मुद्दा कितना चुनावी लाभ दिला पाता है। भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानून वापस लेने के बाद अब उसके खिलाफ नकारात्मक माहौल नहीं रह गया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के सामने भी चुनौती है कि यदि इस बार उसके गठबंधन की सरकार नहीं बनी तो पार्टी को संभाले रखना मुश्किल हो जायेगा। मणिपुर की 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए भी चुनाव कराये जाने हैं। वहां इस समय पहली भाजपा सरकार है। मणिपुर में भाजपा शासन में विकास के कार्य तो कई हुए हैं साथ ही प्रदेश में शांति भी स्थापित हुई है। वरना पहले हड़तालें आदि ही चलती रहती थीं। पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास कार्यों को जिस तरह से केंद्र सरकार वरीयता दे रही है उसका लाभ यहां भाजपा को मिल सकता है। लेकिन नगालैंड की हाल की घटना के बाद अफ्सपा वापसी की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे में यहां रैलियां करने के लिए जब भाजपा के आला नेता आयेंगे तो उसने जनता जरूर सवाल करेगी। प्रदेश कांग्रेस ने तो आगे बढ़ कर वादा भी कर दिया है कि यदि वह सत्ता में आई तो कैबिनेट की पहली बैठक में पूरे प्रदेश से अफ्सपा हटाने का फैसला लिया जायेगा। कांग्रेस ने यहां हाल ही में पार्टी में कुछ बदलाव कर संगठन में जान फूंकने की कोशिश की है लेकिन पार्टी में चल रही उठापटक उसे नुकसान पहुँचा सकती है। पिछले चुनावों में भी सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद कांग्रेस यहां सरकार नहीं बना पाई थी जबकि भाजपा ने कुछ सहयोगी दलों को साथ लेकर पूरे पाँच साल सरकार चला कर दिखा दिया। मणिपुर में यदि मुख्यमंत्री एन. बीरेंद्र सिंह दोबारा सत्ता में लौटते हैं तो भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हो सकते हैं। बहरहाल, पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश को जीतना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। विपक्ष के अनेक दल भी इस बात को समझ रहे हैं कि यदि साल 2024 में देश में होने वाले आम चुनावों में भाजपा का मुकाबला करना है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोकना होगा। देखना होगा कि सारे दलों का यह संयुक्त प्रयास क्या इस बार कोई रंग लाता है या पाँचों राज्यों में भगवा फहराता है। वैसे यदि पाँचों राज्यों में भाजपा की जीत हुई तो इतना तय है कि 2024 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करना विपक्ष के लिए और कठिन हो जायेगा। लेकिन इसके उलट यदि भाजपा सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही सरकार बनाने से चूकती है तो उसको आगे के लिए अपनी रणनीति नये सिरे से तय करनी होगी।
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