कीर्तिमान
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक ऐसा शहर जिसमें न कभी ज्यादा ठंड, ना गर्मी, ना ही अधिक बारिश की वजह से बाढ़ का डर। प्रकृति भी यहां इतनी प्रसन्न है कि अपने सारे आशीष यहां के वातावरण को दे रही है। जहां शहर से कुछ ही दूरी पर चारों दिशाओं में फैले जंगल और उसमें पानी के झरने धरती पर स्वर्ग की अनुभूति कराता है।
माघ, चैत, वैशाख के महीने में उन जंगलों के साल एवं पलाश के वृक्षों मे खिले फूल और नये-नये हरे पत्ते पूरे वातावरण को सुगंधित करता है और फिर वर्षा ऋतु के क्या कहने। ये तो बात हुई रांची शहर के आसपास की, जो इसे किसी अद्भुत माणिक की तरह सुशोभित करता है।
वहीं दूसरी तरफ शहर के मध्य में स्थित रांची बड़ा तालाब जो कभी कई एकड़ भूमि में हुआ करता था। आज अतिक्रमण की वजह से भले कुछ छोटा हो गया है लेकिन फिर भी शहर के लिए किसी बेशकीमती आभूषण से कम नहीं।
रांची का प्राचीन पहाड़ी मंदिर भगवान शिव और नाग देवता का पावन स्थल है। इस आस्था के स्थल से रांची बड़ा तालाब की खूबसूरती को निहारा जा सकता है। रांची शहर के बिल्कुल मध्य में स्थित ये दो वो जगह हैं जिन्हें उनकी प्रकृति में रखते हुए इसकी साफ सफाई और सौन्दर्यकरण करना आवश्यक है।
किसी भी राज्य की राजधानी में ऐसे प्राकृतिक स्थान का होना बहुत ही सौभाग्य की बात होती है। वर्षों से रांची के स्थानीय लोग इन दोनों स्थानों की पूजा तथा अपने आध्यत्मिक क्रियाकलाप इसपे करते आये हैं, आज भी सभी की आस्था इनसे जुड़ी है। इसे विदेशों के विकसित शहरों में स्थित जलाशयों की तरह सजाया जा सकता है, एक पर्यटन स्थल का रूप दिया जा सकता है।
2000ई. में बिहार से अलग हो झारखंड राज्य बनने और रांची शहर को इस नये राज्य की राजधानी के रूप में बनाने के पूर्व इस शहर की प्रकृति को समझने की किसी ने कोशिश ही नहीं की। इसे राजधानी बना दिया गया। सारी व्यवस्था होने के कारण, लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि राजधानी बनने से कई परिवार भी बसेंगे, कई लोगों का आना जाना होगा। क्या इसके लिए रांची शहर की प्रकृति तैयार थी ?
आज चौबीस वर्षों से झारखंड की अस्थिर सरकार कभी इस शहर की प्रकृति को यथा स्थिति रखने के लिए शायद ही किसी प्रकार की परियोजना को व्यवस्थित रूप से संचालित की हो। हम बड़ा तालाब को ही ले लें जिसे इस शहर की शोभा के रूप में माना जाता है। उसे भी नहीं छोड़ा गया। इसकी भूमि का अतिक्रमण किया गया। तालाब के आसपास सरकारी भूमि पर न जाने किसकी अनुमति से मुर्गियों के फार्म खोले गये और इसके बदबूदार मल तालाब एवं इसके आस पास फेके जाते रहे हैं।
वर्षों पुराने पीपल जैसे वृक्षों को भी नहीं छोड़ा गया, पीपल एक ऐसा वृक्ष जो बिना कुछ मांगे चौबीस घंटे प्राण वायु रूपी आक्सीजन वायुमंडल मे संचालित करता है। पास मे ही कयी वर्षों से बंद पड़े चीनी मिट्टी का कारखाना है, जिसमे कुछ वर्ष हुवे कयी बड़े बड़े वृक्ष लताये हुवा करती थी लेकिन मौजूदा स्थिति ये है कि कारखाने का घेरा को तोड़ कर इसमे कूडो का अम्बार लगा दिया गया।
इन कूडो के चलते वहाँ के पेड़ पोधे या तो सुख गए और जो नही सूखे उन्हे जला कर सुखा दिया गया या साफ साफ कहें तो कत्ल कर दिया गया। इस हरे भरे स्थान मे कचरे फेकने का सुरूवात उस समय हुवा जब बड़ा तालाब के जल कुमभियों की सफाई की जा रही थी और उन सभी को शहर के बीचों बीच कुछ छेत्रिय नेताओं के संरक्षण मे जमा किया गया, सड़ते जल कुम्भी और इससे उठते दुर्गन्ध से सारा वातावरण कयी दिनो तक प्रदूषित रहा लेकिन किसी को कोई फर्क नही पडा।
इसी के बाद ट्रैक्टर और अन्य वाहनों के द्वारा पूरे रांची नगर कर कचरा फेकना शुरू किया गया और देखते-देखते कुछ ही वर्ष मे चार फिट ऊँचा कचरा का अम्बार खड़ा हो गया। सारे वृक्ष सुख गए, सहर मे रहने वाले पक्षीयों के घर छीन गए और कई वर्ष पुराने पीपल के वृक्ष को जला कर उसके मुख्य तना को छील कर वृक्ष को पूर्ण रूप रे सुखा दिया गया। बहुत दुख होता है उस वृक्ष और उसपे विश्राम करने वाले पक्षियों के घोषलों को देख कर।
इन सबको देख कर ये आसानी से समझा जा सकता है की इस खाली सरकारी भूमि पे भूमि माफिया और आस पास के लोगों का अतिक्रमण करने का मनसा है। शहर मे ऐसे कुछ ही खाली स्थान हैं जहाँ भूमि जल स्तर को सुधारने के लिए वर्षा की पानी को वृक्षों के माध्यम से कुछ देर के लिए रोका जा सकता है, बाकी पूरा शहर तो कंक्रीट का बन ही गया है।
ये बड़ा तालाब और इसके आस-पास सरकारी खाली भूमि जिनमे वर्षा जल जमा होकर वृक्ष के जड़ों के माध्यम से जल संरक्षण मे मददगार होता है। इन खाली सरकारी भूमि को अतिक्रमण से बचाना बहुत ही आवश्यक है। शहर के ज्यादातर छेत्रों मे भूमि जल स्तर हजारों फिट निचे चले गए हैं, अगर इन जलासयों तथा वृक्षों को अभी नही संजोया सम्हाला गया तो शीघ्र हमारा सुंदर खुशहाल रांची सूख जाएगा और किसी मरभूमि का रूप ले लेगा।
जिसका परिणाम हम रांची वाशियों के लिए बहुत ही घातक होगा, प्रक्रिती इसका पूरा हिसाब पूरे ब्याज के साथ हम रांची वाशियों से वसूल करेगी, पश्चाताप करना भी नामुमकीन होगा। झारखंड वाशी प्रक्रिती की पूजा करते आये हैं और इस लिए प्रक्रिती रूपी माता का सेवा भी इसके वृक्ष और जलासयों को सनरक्षित कर के किया जा सकता है, ये समय की मांग भी है।
अगर रांची वाशी अभी सचेत नही हुवे, नगर निगम और संबंधित विभाग जागरूकता से काम नही किये तो हमारा प्यारा, सुंदर, खुशहाल रांची शहर सुखता चला जाएगा और ये सभी जीव, जंतु, पशु, पक्षी तथा मानव के लिए किसी मरभूमि कि तरह निवास करने योग्य नही रह जाएगा।