एबीएन डेस्क (मनोज शर्मा)। मैं किशोर उम्र में बैडमिंटन का अच्छा खिलाड़ी था। हालांकि अभी मीडिया कप बैडमिंटन में मेरी धुलाई हो गयी। तब हम सभी खिलाड़ी खुद कोर्ट तैयार करते थे। 22 गुणा 44 फिट का और लकीर खींच कर चूना डालते थे। तब कुछ भी कर लें, नेट के दोनों ओर का कोई एक हाफ अच्छा दूसरा उबड़-खाबड़ ही होता था। अच्छे हाफ के दौरान उधर से खेलने वाला ज्यादा जीतता था। उस अच्छे कोर्ट से खेलने के लिये लड़ाई झगड़ा सब होता था। अपुन भी जिद्दी और लड़ाकू था। सो मैंने खराब सिरे वाले कोर्ट से खेलना शुरू किया और जीतने लगा। अब मेरे साथ अलग समस्या हो गयी कि अच्छे कोर्ट से खेलने पर हारने लगा। मेरे पैरों और दिमाग को खराब उबड़ खाबड़ कोर्ट की आदत पड़ गयी थी। मेरे पैर दौड़ते और शॉट मारते समय गड्ढे और उंचे जगहों पर बैलेंस बनाने के आदी हो गये थे। चिकने और सही कोर्ट में मैं दिमागी तौर पर असहज होने लगता था। अब कुछ ऐसी ही समस्या काशी में बाबा विश्वनाथ परिसर के संवरने से कुछ तबके को हो रही है। उनका कहना है कि बाबा विश्वनाथ परिसर के संवरने से गलियां खत्म हो गयीं, जिसे देखने सैलानी आते थे। यह बनारस की खुबसूरती थी। कमबख्तों को जब तक इन गलियों में सांड़ रास्ता रोके न दिखे। बस्ता लादे दो व्यक्ति रगड़ा न खायें। इन गलियों में सैलानियों को ठगने घुमाने वाले न रहें, तब तक इन असंतुष्ट लोगों को मन नहीं लगता। अफसोस कि इन गलियों के पक्ष में दबी जुबान में ही एनडीटीवी के कमाल खान भी बोलते नजर आये।
अरे विघ्नसंतोषियों काशी के बारे में एक कहावत है कि ..
रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी
इनसे बचो तो सेवो काशी।
ये चार चीजें वहां रहेंगी ही। तो जाओ घाट पर बैठ कर चिलम टानो...(लेखक पत्रकारिता विभाग रांची विश्वविद्यालय से जुड़े हैं।)